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एंटीबायटिक दवाएं-2

दवा की पूरी डोज लें : हरेक दवा की खुराक कई चीजों को ध्यान में रखकर तय की जाती है जैसे कोई दवा कितने घंटों तक शरीर पर असर करती है? उसका पूरा असर किस मात्रा में मिल पाता है? रोग को मात देने में कितने दिन लगने की संभावना है, आदि?

कुछ लोग इस चक्कर में एंटीबायटिक का गुड़-गोबर कर देते हैं कि दवा जितनी कम ली जाए, उतना ही अच्छा है। कुछ इस सोच के कारण भी एंटीबायटिक बीच में बंद कर देते हैं कि यह गरमी करती हैं। यह ठीक है कि कुछ दवाएं मुंह और गले को खुश्क बनाती हैं, कुछ बदन में गरमाहट पैदा करती हैं, और कुछ मूत्र का रंग भी बदल देती हैं, पर इन परिवर्तनों के पीछे कोई न कोई जैविक कारण होता है, दवा की गरमी जिम्मेदार नहीं होती। जैसे, अनेक दवाएं गुर्दो से छनकर मूत्र में खारिज होती हैं, इसी से उन्हें लेने पर मूत्र का रंग गहरा हो जाता है। अत: किसी एंटीबायटिक दवा से अगर कोई परेशानी महसूस करें, तो डाक्टर से सुझाव लें, न कि अपने से दवा बंद कर दें।

आधी-अधूरी दवा लेना आग से खेलना : समय से पहले दवा बंद करने, आधी-अधूरी मात्रा में लेने या ठीक समय पर न लेने के अनेक खतरे हैं। इस मामले में असावधानी बरतने से न सिर्फ दवा बेअसर रह जाती है, बल्कि आगे भी परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। समय से पहले दवा बंद करने या उसे कम मात्रा में लेने से बैक्टीरिया दवा के प्रति रजिस्टेंस विकसित कर लेते हैं। ऐसे में दवा बैक्टीरिया पर असर नहीं कर पाती और रोग बिगड़ जाता है। इसका खामियाजा न सिर्फ उस एक व्यक्ति को, बल्कि समाज को भुगतना पड़ता है।

मरीज की हालत में सुधार न होता देख डाक्टर गुमराह हो जाता है और यह सोचने को विवश हो जाता है कि कहीं उस का डायग्नोसिस ही गलत तो नहीं। ऐसे में मरीज के तरह-तरह के जांच-परीक्षण होते रहते हैं और मामला अनावश्यक ही उलझ जाता है।

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