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स्कूलों में न बजे मोबाइल की रिंगटोन

सीबीएसई ने स्कूलों में मोबाइल फोन पर रोक लगाकर बहुत ही अच्छा काम किया है, क्योंकि मोबाइल फोन छात्रों की शिक्षा में दखल तो देता ही है, इसके अलावा वे एसएमएस, एमएमएस तथा फोटो भी खींचते हैं। डीपीएस कांड की तरह कई विद्यालय में अब तक गंभीर घटनाएं घट चुकी हैं। विद्यालय प्रशासन को सीबीएसई के निर्देश को अमली जामा पहनाने में तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए। इससे छात्र-छात्राओं की शिक्षा में दखल और समय की बर्बादी नहीं होगी। साथ ही साथ अभिभावक भी अपने बच्चों को फोन न दें। अगर अत्यंत आवश्यक हो तो शिक्षकों तथा विद्यालय प्राचार्य से संपर्क में रहें।

शक्तिवीर सिंह ‘स्वतंत्र’,  नई दिल्ली

धर्म जब व्यवसाय बन जाए
आज यदि दुनिया में सबसे अधिक अशांति का कारक तलाशें तो उसकी जड़ें किसी न किसी धार्मिक पाखंड में मिलेंगी। धर्म जब आय या प्रभाव का कारक बन जता है, तब वह समाज घातक हो जाता है। न्यायालय द्वारा यह व्यवस्था देना कि धर्म के नाम पर अतिक्रमण रोका जाए, संकेत है कि विधायिका, कार्यपालिका, धार्मिक प्रदूषण से समाज को बचाने में विफल रही हैं। सऊदी अरबिया दुनिया का सबसे कट्टर इस्लामिक देश है। वहां सैकड़ों मस्जिदें एक स्थान से उठा कर दूसरे स्थान पर स्थानांतरिक की जा चुकी हैं। यदि वहां मस्जिद हटाई जा सकती है तो भारत में क्यों नहीं हटाई ज सकती हैं? यदि मस्जिद हटाई ज सकती है तो मंदिर, चर्च व गुरुद्वारे क्यों नहीं हटाए जा सकते हैं? धर्म एक व्यवसाय बन गया है। उसे रोकना लगभग असंभव सा हो गया है। आज न्यायालय जागा है, कल समाज भी जगेगा।

ठाकुर सोहन सिंह भदौरिया, बीकानेर

आखिर नेता ही हैं न
अब ब्रिटिश सांसद भी भारत के सांसदों के गुर मान रहे हैं। एक पत्रकार ने खुलासा किया है कि वहां के सांसदों ने दो-दो मकानों के किराए, घोड़े की लीद उठाने का खर्च, टीवी, मकान की सजवट आदि के बेतुके बिल पेश कर रहे हैं। भारत के सांसदों और ब्रिटिश सांसदों में यही अंतर है। यहां के सांसदों के अनैतिक कृत्यों को लोगों ने स्वीकार कर लिया है। जबकि ब्रिटिश सांसदों की हरकत पर वहां बवाल मचा हुआ है। वहां की जनता सांसदों के इस आचरण का विरोध करके अपनी जागरुकता का परिचय दिया है,जो कि सही है। भारत की जनता को भी नेताओं के गलत आचरण का विरोध करना चाहिए।

 दिलीप कुमार गुप्ता, बरेली

शिक्षा की गुणवत्ता
गुरु-शिष्य के रिश्ते में पहले जैसी आत्मीयता क्यों नहीं रही? दरअसल आज समाज में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी का बोलबाला है। धन ही सर्वोपरि हो गया है। जब धन से प्रत्येक वस्तु खरीदी जाने लगी है, तब से इसका असर शिक्षा पर भी पड़ने लगा है। आज शिक्षक भी पहले जैसे नहीं रहे। उन्होंने भी इसे व्यवसाय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वे अब स्कूल, कॉलेज में पढ़ाने के बदले कोचिंग इंस्टीट्यूट में अच्छी तरह से पढ़ाते हैं। गुरु-शिष्य के आपसी रिश्ते में कमी का एक अहम कारण टीवी तथा फिल्में कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। इन दोनों ने ही बच्चों के दिमाग को इतना प्रभावित कर दिया है कि वे बड़ों का सम्मान करना भूलते जा रहे हैं। पहले जहां शिक्षा ज्ञानाजर्न का माध्यम थी और ज्ञान देना शिक्षकों का कर्तव्य होता था वहीं आज शिक्षा की गुणवत्ता गौण हो गई है।

   सत्यपाल सिंह नेगी, रुद्रप्रयाग

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