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पंचायती राज के दोस्त हैं तो दुश्मन भी

पंद्रह मई, 1989 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने के उद्देश्य से पहली बार संवैधानिक संशोधन (64 वां) पेश किया था तो उन्होंने कहा- ‘हम भारतीय जनता को अधिकतम लोकतंत्र और अधिकतम सत्ता का हस्तांतरण सुनिश्चित करना चाहते हैं। हम सत्ता के दलालों का खात्मा चाहते हैं।’ 20 साल बीत चुके हैं। हमने संविधान में संशोधन (73 एवं 74वां) कर नई पीढ़ी की पंचायती राज व्यवस्था लागू की, लेकिन क्या जनता को वाकई सत्ता हस्तांतरित हुई?

स्थानीय सरकारों को संवधानिक दर्जा देने में हमें चार दशक से भी ज्यादा समय लगा, पर पिछले पांच सालों के दौरान ही पंचायतें कुछ ठोस असर दिखा पाईं। यूपीए सरकार ने पंचायती राज विभाग को एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाया था, जिससे पूरा माहौल ही बदल गया। आदर्श स्थिति यह होती कि स्थानीय स्वशासन मंत्रालय बनाया जाता, फिर भी पंचायती राज मंत्रालय ने देश की 70 प्रतिशत जनता पर असाधारण प्रभाव डाला है। आम जनता की जिंदगी से जुड़े विभिन्न मसलों पर इसने जोरदार राष्ट्रीय बहस शुरू और राज्य स्तर पर उन विचारों व कार्यक्रमों का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे पंचायतें स्वशासन की सक्षम संस्थाएं बनें।

ऐसा लगता है कि सरकार बुनियादी ढांचागत मसले निपटाने की कोशिश नहीं कर रही, जिससे प्रतिगामी ताकतें फूलती-फलती हैं औरजनता को अधिकार देना महज कागजी बन जता है। इस श्रेणी में सबसे पहले स्वयं नेतागण आते हैं। जब हम देखते हैं कि राजनीतिकविकेंद्रीकरण और स्थानीय सरकारों को अधिकार-संपन्न बनाने की प्रक्रिया में नेतागण अड़ंगा डालते हैं तो प्रो. दांतेवाला की यह टिप्पणीबरबस याद आती है कि नेता चाहे जो कहते हों, वे प्रतिस्पर्धी राजनीतिक ताकतों का उदय रोकने की राजनीतिक मजबूरियों के चलते विकेंद्रीकरण के विचार के खिलाफ कदम उठाते हैं। सांसदों की जिम्मेदारी है कि वे राष्ट्रीय और जनता को प्रभावित करने वाले मसलों पर चर्चा-बहस करें और कानून बनाएं। लेकिन, वे माइक्रो विकास के एजेंट्स के रूप में कार्य करने को उत्सुक रहते हैं। किसी भी सांसद को स्थानीय इलाके के विकास फंड के रूप में प्रतिवर्ष दो करोड़ रुपए के आवंटन का क्या तुक है? इस फंड से बनने वाले किसी बस स्टैंड, पुलिया, मंदिर की आधारशिला या टॉयलेट ब्लॉक पर सांसदगण अपना नाम लिखवाना चाहेंगे। जहां एक ओर पंचायतों को पर्याप्त फंड्स नहीं मिलते, वहीं दूसरी ओर सांसदों को अपना वोट बैंक बनाने और उसके संरक्षण के लिए करोड़ों रुपए दिए जा रहे हैं। पर, जनता को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बनाया ज सकता। लोकसभा के पिछले चुनाव में कई निवर्तमान सांसदों की हार यही दर्शाती है।
यही बात विधायकों पर लागू होती है। स्थानीय क्षेत्र के विकास के लिए उनके पास फंड्स नहीं होते। वे जनता के नजदीक हैं, इसलिए जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर पंचायतों को अधिक अधिकार देने के किसी भी कदम के प्रति वे विमुख रहते हैं। पंचायती राज मंत्रालय द्वारागोलमेज बैठकों, राज्य सरकार के साथ ज्ञापन-पत्र पर हस्ताक्षर जैसे नवीन कार्यक्रम शुरू करने के बावजूद अधिकतर राज्यों ने पंचायती राज अधिनियमों को उनकी भावना के अनुरूप क्रियान्वित नहीं किया, क्योंकि विधायक इस रास्ते में रोड़ा बनते हैं। अगर उन्हें खुली छूट दे दी जाए तो वे पंचायतों के चुनाव भी नहीं होने देंगे। इसका एक जीवंत उदाहरण झारखंड है, जहां पंचायतों के चुनाव आज तक नहीं कराए गए।
देश की नौकरशाही इसको लेकर खुश नहीं है कि पंचायतें स्वशासी संस्थाओं या गवर्नेस के तीसरे खंभे के रूप में उभरें। हमारी प्रशासनिक संस्कृति सरकारी विभागों के अधिकार बरकरार रखने और जनता को अधिकार न देने की रही है। 1995 में मैंने आंध्र प्रदेश के शादनगर में एक अध्ययन किया, जहां 11 अक्तूबर, 1959 को पंडित नेहरू ने दक्षिण भारत में पहली पंचायत का उद्घाटन किया था। वहां पंचायती राज क्यों नाकाम रहा, इस सवाल के जवाब में एक बुजुर्ग ने कहा- ‘अधिकारी, गैर-अधिकारियों, खासकर गांवों के जनप्रतिनिधियों को अधिकार देने के खिलाफ काम करते हैं। इसमें उनकी राज्य-स्तरीय नेताओं से मिलीभगत रहती है। पंचायतों की नई पीढ़ी ध्वस्त करने के लिए वे ऐसे समानांतर निकाय बनाते हैं, जिनका लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई स्थानीय निकायों पर विध्वंसकारी असर पड़ता है।’ यदि विभिन्न स्तरों पर नेताओं और अफसरों के बीच साठ-गांठ के खात्मे के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो जनता को अधिक अधिकार दिलाना महज एक सपना बना रहेगा।

ग्रामीण इलाकों में आज भी जमींदार और सवर्ण जति के लोगों का हरेक क्षेत्र में दबदबा है। अधिकतर राज्यों में भूमि सुधारों पर कागजी अमल हुआ है। अध्ययन दर्शाते हैं कि यदि लगभग 8,000 की आबादी वाली ग्राम पंचायत को एक उदाहरण मानें तो 70 प्रतिशत लोगों के पास भूमि नहीं है और शेष 30 प्रतिशत लोगों का ग्राम सभा बैठकों से लेकर पंचायतों पर नियंत्रण रहता है। यही जमींदार या अमीर लोग मुखिया/सरपंच/अध्यक्ष चुने जाते हैं। यही लोग विधानसभा और संसद के चुनाव पर असर रखते हैं, जिसमें नरेगा का कार्यान्वयन भी शामिल है। ग्रामसेवक से लेकर बीडीओ और अन्य अधिकारी गांव के उपरोक्त 30 प्रतिशत जमींदारों के साथ राजी-खुशी कार्य करते हैं। यदि कोई दलित, साहसी महिला, आदर्शवादी व्यक्ति उनके कार्यो पर सवालिया निशान लगाता है या चुना जाता है तो उसे जमींदारों या सवर्ण जाति केलोगों का कोपभाजन बनना पड़ता है। 1994 से जमीनी स्तर पर लोकतंत्र लागू होने पर जो खूनखराबा हुआ, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। मदुरै की लाली देवी, पूर्वी गोदावरी की धूला रत्नम, मध्य प्रदेश में बेतूल की सुखियाबाई, तमिलनाडु में मेलावालावू के मुरुगेसन और मूकन जैसे अनेक लोगों को शहीद होना पड़ा, क्योंकि उन्होंने जनता को अधिकार दिलाने की जंग लड़ी थी। पर, सरकार इन घटनाओं को दबाने की कोशिश करती है।

स्थानीय सरकारों में लगभग 32 लाख प्रतिनिधियों और अध्यक्षों के बजाए केंद्र और राज्यों की राजधानियों में अफसरों के साथ नाता रखना सत्ता के दलालों को अधिक आसान लगता है। जिस नरेगा की तारीफ की जाती है, उसमें ठेकेदारों पर रोक है। फिर भी, उसमें अधिकारियों के साथ ठेकेदारों की साठ-गांठ की काफी गुंजाइश है। नेताओं और नौकरशाहों का एक छोटा वर्ग है, जो जनता को अधिक अधिकार देने का पक्षधर हैं। कुल संख्या में उसका आकार भले ही छोटा है, पर उसकी वचनबद्धता ने कुछ क्षेत्रों में पंचायती राज का परचम लहराए रखा है। जो नेता सत्ता की कुर्सी पर बैठे हैं, वे लोकतंत्र में संप्रभु मानी जाने वाली जनता के समर्थन की बदौलत वहां हैं। इसलिए, वक्त आ गया है कि जनता को अधिक अधिकार देने को हकीकत में तब्दील किया जाए। 
 
gemathew@yahoo.co.in
लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के निदेशक हैं

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