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लाइव हिन्दुस्तान टीम
Wed, 12 Aug 2009 10:36 PM
गरीबी: परिभाषा में उलझी योजनाएं

यकीनन मानसून की बेरुखी से इस समय जब देश के तीन चौथाई हिस्सों में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं और कमरतोड़ महंगाई के कारण देश के करोड़ों गरीबों की भूख पीड़ाएं बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही हैं। हालांकि इन गरीबों की परिभाषा क्या हो इसे लेकर उलझन बरकरार है। अभी तक देश में गरीबी की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं बन पाई है। यह भी विडम्बना ही है कि भारत में गरीबी निवारण के जो तरह-तरह के अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, उनमें गरीबी अलग-अलग तरीकों से परिभाषित हो रही है और गरीबी के बारे में कई तरह के आंकड़े हैं। सरकार प्रतिवर्ष विभिन्न गरीबी निवारण योजनाओं पर एक लाख करोड़ रुपए से भी अधिक धन खर्च करती है, लेकिन उस धन से कितने गरीब लाभान्वित हो रहे हैं और कितनी गरीबी कम हो रही है, उसमें भी तरह-तरह के विश्लेषण हैं।

हाल ही में 11 जुलाई, 2009 को कृषि मंत्री शरद पवार ने राज्यसभा में स्वीकार किया है कि देश में आर्थिक विश्लेषण से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों ने अलग-अलग परिभाषाओं के तहत गरीबी के अलग-अलग आंकड़े बताए हैं। सरकार का गरीबी का आधिकारिक आकड़ा चार
दशक पहले तैयार किया गया है और यह भोजन की जरूरत पर होने वाली लागत पर आधारित किया गया है। ऐसा आधिकारिक आकलन अब उपयोगी और वस्तुपरक नहीं है, लेकिन फिर भी सरकार इसी आधार पर कह रही है कि देश की 28.6 फीसदी आबादी से जुड़े हुए 6.52 करोड़ परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं। सरकार के अलावा गरीबी के आंकड़े एकत्रित करने वाले कुछ संगठन गरीबी बढ़ने के तो कुछ गरीबी घटने के विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। देश में शासकीय स्तर पर आर्थिक-सामाजिक आकड़े एकत्रित करने वाले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के द्वारा गरीबी से संबंधित जारी किए नवीनतम आकड़ों के अनुसार गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली जनसंख्या का अनुपात 1993-94 में 36.0 प्रतिशत था जो 2004-05 में 27.5 प्रतिशत रह गया है।

2004-05 में ग्रामीण क्षेत्रों में 28.3 प्रतिशत व शहरी क्षेत्रों में 25.7 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे थी। अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी के द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार देश की 77 फीसदी आबादी जो 20 रुपए प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करती है, वह आबादी गरीबी रेखा से नीचे है। इन आकड़ों में गरीबी रेखा के आकलन के लिए प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय को आधार बनाया गया है।
ग्रामीण विकास मंत्रालय ने गरीबी रेखा के नीचे संबंधी आकलन में गरीब उन्हें माना है, जो दिनभर में 15 रुपए से कम कमाता हो। इस मानक के मुताबिक पक्के मकानों में रहने वाले, साफ पीने के पानी की सुविधा वाले, शौचालय वाले और पढ़े-लिखे लोग गरीबी रेखा के नीचे नहीं माने जाएंगे। इसी तरह विश्व बैंक ने हाल ही में जारी अपने एक नवीनतम अध्ययन में बताया है कि 2005 में भारत की 42 फीसदी आबादी अर्थात 46 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करते हैं। अब केंद्र सरकार को इस बारे में भी सोचना चाहिए कि जब विश्व बैंक और एनएसएसओ प्रति व्यक्ति मासिक उपयोग व्यय को आधार मानते हुए गरीबी का आकलन करते हैं तो फिर जो निष्कर्ष निकलते हैं, वे एक दूसरे से भारी विभिन्नता वाले क्यों हैं?
गरीबों के सामाजिक-आर्थिक विकास की प्रत्येक योजना बनाते समय गरीबों की वास्तविक संख्या के आंकड़े नहीं होने से अच्छी लाभप्रद योजनाओं की सफलता पीछे रह जाती है। ऐसा ही कुछ इन दिनों केंद्र सरकार के द्वारा गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली देश की करीब एक तिहाई आबादी को भूख की पीड़ाओं से बचाने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक तैयार करते समय दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के तहत प्रत्येक गरीबी रेखा से नीचे वाले परिवार को 3 रुपए प्रति किलो की दर से 25 किलोग्राम खाद्यान्न प्रतिमाह देने की गारंटी दी जाएगी। वर्ष 2009 के आम चुनाव के दौरान यूपीए के द्वारा गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे प्रत्येक परिवार को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने का वादा किया गया था।
अब यूपीए की नई सरकार इस महत्वाकांक्षी वादे को पूरा करने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की वास्तविक संख्या पर निर्भर करेगी, लेकिन सरकार गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की वास्तविक संख्या चिन्हित करने में कठिनाई अनुभव कर रही है।

j1bhandari@yahoo.com
लेखक आर्थिक मामलों की जानकार हैं

 

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