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ज्ञान का अर्थ

जब कोई ज्ञान की बात होती है तो उसका सीधा मतलब होता है किसी काम से। हमारे स्कूलों ने जीवन केंद्रित काम को एकदम नज़रदांज करते हुए जानकारी को कंठस्थ करने, बार-बार सस्वर पाठ करने की शैक्षणिक प्रथाओं को न केवल बढ़ावा दिया है। और इसी को ज्ञान मानने की गलतफहमी भी दी है।
  यही कारण है कि शिक्षा में ज्ञान की समझ के भ्रष्ट हो जाने के कारण स्कूलों का यह हाल हुआ। ज्ञान कई मायनों में मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है। ज्ञान पूरी तरह से दिमागी क्रिया नहीं है, बल्कि इसका संबंध दिल से भी है। गांधी ने नई तालीम में ज्ञान के सृजन पर काफी बल दिया है। यही कारण है कि नई तालीम में शिक्षा का प्रमुख आधार हाथों से काम करने को कहा है। ज्ञान को इंसान के सशक्तीकरण के एक साधन के रूप में देखा जाता है। एक ऐसी शक्ति, जो इंसान के जीवन को प्रभावित करती है और सामाजिक बदलाव की दिशा को प्रभावित करने की ताकत रखती है। इसलिए वास्तविक शिक्षा वह है, जो व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को विकसित करने के लायक बनाती है, ताकि उस संसार को समझ सके, जहां वह रहता है। ज्ञान की तुलना जानकारी या सूचना के साथ करने से हालांकि दुनिया भर में आलोचना हुई है। स्वामी विवेकानंद, गांधी और अन्य विचारकों ने ज्ञान और सूचना के फर्क पर काफी कुछ कहा है। विवेकानंद ने किताबी पढ़ाई और रटकर कंठस्थ करने की काफी कड़े शब्दों में आलोचना की है। उनके शब्दों में शिक्षा सूचना का वह ढेर नहीं है, जो आपके दिमाग में ठूंसा जाता है और जो वहां जीवन भर अपरिचित रह कर उत्पात मचाता रहता है। गांधी ने तो यहां तक कहा कि किताब के माध्यम से दी जाने वाली सूचना आधारित शिक्षा, छात्र और समाज के लिए घातक है।

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