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सम्मान से बचना

सम्मानित होना एक कला है। अक्सर सम्मान करने वाले इस अंदाज में सम्मान करते हैं कि ऐसा लगता है कि इससे तो अपमान भला। लेकिन जो सम्मानित होने की कला जानते हैं वे उसमें से अपमानित होने वाले पक्ष से सफाई से कन्नी काट लेते हैं और सम्मान के साथ मुस्कुराते हुए फोटो खिंचवा लेते हैं। सम्मान पाने वाले को मोटी चमड़ी वाला होना पड़ता है।

सम्मान करने वाले ऐसी जगह पर पांव छू लेते हैं कि किसी शर्मदार आदमी को जमीन में गड़ जाने की इच्छा हो जाए, लेकिन पेशेवर या अभ्यस्त सम्मानित मजे में मुस्कुराते हुए पांव पड़े को आशीर्वाद देते हैं। सम्मान और अपमान के बीच की बारीक लकीर पर चलने का नुस्खा यह है कि अपमान की तरफ देखो भी नहीं, जैसे वह है ही नहीं। सम्मान करने वाले को सम्मान करना आए, यह जरूरी थोड़े ही है, उसका कर्म नहीं उसके पीछे की भावना देखनी चाहिए। यह समझना चाहिए कि वह ढंग से कर नहीं पा रहा, लेकिन वह दरअसल सम्मान कर रहा है। हमें ऐसा समझना चाहिए, भले ही ऐसा न हो। अगर यह नहीं कर सकते या किसी पर लड़ नहीं सकते कि मेरा सम्मान तो करना ही होगा, तो बेहतर है कि इन षडयंत्रों में न पड़ा जाए और अपने घर पर चैन से रहें। अब कार्ल मार्क्स नामक सज्जन जोसेफ स्टालिन के पीछे हाथ धो कर तो नहीं पड़े थे कि तुम मार्क्सवादी हो जाओ और मार्क्सवाद के नाम पर जितने लोगों की संभव हो, हत्या कर दो। न मार्क्स ने प्रसिद्ध आलोचक अमुक प्रसाद जी से सविनय आग्रह किया था कि वे जिला प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव हो जाएं और हर ठीक-ठाक लेखक को प्रतिक्रियावादी घोषित कर दें। लेकिन मार्क्स की यह गलती थी कि उसने ढेर सी किताबें लिखीं, और छपवाईं। जहिर है इसका अर्थ ही यह था कि मार्क्स चाहते थे कि लोग उनके विचारों से प्रभावित हों। ऐसा हुआ।

महात्मा गांधी भी नहीं चाहते होंगे कि देश के तमाम भ्रष्ट और निकम्मे राजनेता वक्त बे वक्त उनके नाम की दुहाई दें और हर दो अक्टूबर को उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाएं। गांधी जी तो यह भी नहीं चाहते थे कि उनकी मूर्तियां लगें। चाहते तो खुद अपनी मूर्तियां नहीं लगवा देते, इतने तो वे समर्थ थे। लेकिन गांधी जी ने एक गड़बड़ तो की थी, उन्होंने भाषण दिए, लेख लिखे। उससे लोग प्रभावित हुए। अब कौन कैसे प्रभावित होगा, यह कैसे तय किया ज सकता है। मार्क्स से प्रभावित लोगों की तरह गांधी से प्रभावित लोगों ने बड़े नरसंहार नहीं किए, लेकिन यथासंभव हिंसा तो उन्होंने की। तात्पर्य यह कि मनुष्य का भला इसी में है कि सम्मान से बचे।

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