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दलितों पर नजर

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दो दिनों के भीतर 45 दलित बहुल गांवों का दौरा कर पार्टी के दलित एजेंडे को धार दे दी है। पार्टी केमहासचिव राहुल गांधी भी दलित घरों में रात बिता कर और संसद में दलित महिला की व्यथा का बयान कर कांग्रेस के खिसक चुकेसामाजिक आधार को वापस लाने की कोशिश करते रहे हैं। इस पर उन्हें बहुजन समाज पार्टी की नेता और मुख्यमंत्री की तल्ख टिप्पणियों का सामना भी करना पड़ा है। लेकिन पिछले लोकसभा चुनावों में दलित समाज का एक हिस्सा जिस तरह कांग्रेस की तरफ झुका है, उससे साफ है कि कांग्रेस को इन कोशिशों का राजनीतिक लाभ मिला है। उत्तर प्रदेश के शासक दल से खीझे दलितों को कांग्रेस के और करीब लाने के लिए सोनिया गांधी ने रायबरेली में जो अभियान चलाया, वह बेहद सघन और प्रभावशाली बताया जा रहा है। भादों महीने की उमस और धूप भरी गर्मी में जिस राजनीतिक ताजगी के साथ उन्होंने गांव-गांव चौपाल की, महिलाओं का हाथ थाम कर उनका दुख दर्द जाना और पुलिस उत्पीड़न का तत्काल समाधान किया, उसमें चुनावी पैंतरेबाजी से ज्यादा सरोकार भी दिखाई पड़ता है। यह सरोकार जातिगत ईर्ष्या और नफरत की राजनीति से अलग समाज के गरीब वर्ग के कल्याण के लिए एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धी राजनीति का आह्वान करता है।  मायावती उत्तर प्रदेश के दलितों की स्वाभाविक नेता हैं और इसी बिना पर वे पहले बहुजन समाज और फिर सर्वजन समाज की नेता बन सकी हैं। पर सिर्फ इतने से राज्य के सभी दलितों का आर्थिक और सामाजिक उत्थान हो गया हो या उन पर होने वाले अत्याचार बंद हो गए हों, ऐसा नहीं है। न ही इसी नाते अन्य पार्टियों को दलित एजेंडा छोड़ देने का कोई औचित्य बनता है।

अगर वोट के बहाने ही सही, उत्तर प्रदेश में समाज के गरीब और कमजोर वर्ग, जिसमें कि निश्चित तौर पर ज्यादा दलित ही हैं, का भला करने की राजनीतिक होड़ शुरू होती है तो इससे पूरी राजनीति का कायाकल्प हो सकता है। इस चुनौती को स्वीकार करने के साथ कांग्रेस को यह भी समझना चाहिए कि वह दलितों के स्वाभिमान की लड़ाई उस तरह से नहीं लड़ सकती, जिस तरह से कांशीराम, मायावती और उनके नेतृत्व में गठित पार्टियां लड़ती हैं। पर वह मूर्तियों और पार्को के बहाने हो रही प्रतीकात्मक राजनीति के खोखलेपन से अलग दलितों के आर्थिक विकास को ठोस राजनीतिक एजेंडा बना सकती है। वह समाज और राजनीति दोनों के हित में होगा। 

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