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मनी, मसल्स और मैन पर कैसे काबू पाएं महिलाएं

मनी, मसल्स और मैन पर कैसे काबू पाएं महिलाएं

सुषमा देवी की उम्र लगभग 32 साल है। वह घबराई हुई-सी अपना गला साफ करती हैं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले की रहने वाली यह दलित महिला 89 किलोमीटर का सफर तय करके लखनऊ पहुंची हैं। वह कहती हैं, ‘दो साल पहले जब मैं गांव में एक बैठक में शामिल होना चाहती थी तो मेरे पति ने कहा था कि घर में खाना कौन बनायेगा, बच्चों की देखभाल कौन करेगा? लेकिन आज मैं खुद को इस काबिल बना पायी हूं कि नेता बनने के लिए यहां तक आ सकूं।’

लखनऊ यूनिवर्सिटी के वूमंस स्टडीज सेंटर के एक हॉल में एक क्लास चल रही है, उन क्लासों से एकदम अलग, जो अक्सर यहां चला करती हैं। यह एक ऐसी क्लास है, जहां महिलाओं को नेता बनने का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां उपस्थित महिलाओं की संख्या लगभग 30 है। ये महिलाएं उत्तर प्रदेश के गांव और आसपास के शहरों से यहां आई हैं। इन महिलाओं के लिए यह कोई छोटी बात नहीं है, खासतौर से यह देखते हुए कि राज्य की राजनीति का कितना खराब चेहरा दिखाई देता है। आंकड़े भी इन महिलाओं के लिए कतई उत्साहवर्धक नहीं हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत सरकार के 33 कैबिनेट मंत्रियों में महज 3 महिलाएं हैं और लोकसभा के 542 सांसदों में से महज 58 महिला सांसद हैं।

दिल्ली स्थित गैर सरकारी संगठन सेंटर फॉर सोशल रिसर्च (सीएसआर) जैंडर ट्रेनिंग सेक्शन की प्रमुख अंजू दुबे कहती हैं, ‘भारत में राजनीति को तीन ‘एम’ नियंत्रित करते हैं: मनी, मैन और मसल्स। और हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं। गौरतलब है कि सीएसआर देश की 1000 महिलाओं को राजनीति का प्रशिक्षण देने की एक मुहिम इस वर्ष फरवरी से चलाए हुए है। इन महिलाओं का चयन देश के अलग-अलग हिस्सों से किया गया है।

बेशक महिला आरक्षण बिल अभी बहस तलब है, लेकिन इन महिलाओं को सिखाया जा रहा है कि कैसे चुनाव जीता जाता है, कैसे वादे किये जाते हैं और कैसे मीडिया से संपर्क बनाए जाते हैं।

हरदोई जिले की कम्युनिटी वर्कर पुष्पा यादव बेहद आशावादी हैं। वह कहती हैं, ‘गांव के लोग मुझ पर भरोसा करते हैं। कल वे मेरे लिए वोट भी करेंगे।’ हरदोई के ही लालमाऊ  गांव की कुष्मा देवी की एक सहज अभिलाषा है, ‘जब मैं नेता बन जाऊंगी तो गांवों में शौचालयों का निर्माण अवश्य कराऊंगी।’ कुष्मा देवी अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों में अपना भाग्य आजमाना चाहती हैं।

लालमाऊ  गांव की ही 35 वर्षीया बिरला मिश्रा का सपना एक दिन दिल्ली आने का है। वह एक बार प्रधान का चुनाव लड़ चुकी हैं, लेकिन अपने पति की वजह से वह यह चुनाव हार गयी थीं, क्योंकि उनके पति ने उसके खिलाफ लड़ रहे प्रत्याशी को समर्थन दिया था। वह कहती हैं, गांवों में प्रधान रबड़ स्टाम्प होता है, लेकिन हम इस स्थिति को बदलना चाहते हैं। लेकिन नेता बनने का प्रशिक्षण लेने आई इन महिलाओं से जब यह पूछा जाता है कि उन्हें टिकट कैसे मिलेगा तो उनकी आंखों में शून्य के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता। राज्य कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा कहती हैं, यह एक धीमी प्रक्रिया है। यहां की महिलाएं मानसिक रूप से इतनी मजबूत नहीं हैं। आरक्षण ने लाखों महिलाओं की उम्मीदों को जगा दिया है, लेकिन पहले इन महिलाओं को अपने अधिकारों के बारे में जानना होगा। चलिए आजादी के साठ साल बाद ही सही महिलाओं को राजनीति में आने का प्रशिक्षण देना तो देश ने शुरू किया!

 

 

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