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विवाहपूर्व सेक्स संबंधों को अनुचित मानते हैं भारतीय

विवाहपूर्व सेक्स संबंधों को अनुचित मानते हैं भारतीय

पिछले कुछ सालों में कितना बदला है हमारा समाज? अब तक टाले या छुपाए जाते रहे मुद्दों पर क्या है इस देश के आम लोगों का नजरिया? स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर हिन्दुस्तान और आईबीएन 7 ने मन बनाया देश का मानस टटोलने का। बदलाव को रेखांकित करते विभिन्न मुद्दों पर देशव्यापी सर्वेक्षण का फैसला करते हुए इसकी जिम्मेदारी दी गई जीएफके-मोड को। सर्वेक्षण के नतीजे कहीं-कहीं चौंकाने वाले और बेहद दिलचस्प हैं।

भारतीय समाज एक वर्जनायुक्त समाज है और यहां शादी से पहले शारीरिक संबंध कायम करना तो दूर उसके बारे में सोचना भी निषिद्ध माना जाता रहा है। आमतौर पर इस दायरे को पार करने वालों को अपने देश में चरित्रहीन माना जाता है। कहने का मतलब यह कि यौन सुख की प्राप्ति के लिए उठाये गए किसी भी 'अनुचित' कदम को सीधे-सीधे चरित्र से जोड़ दिया जाता है। बदलाव का पहिया भले जितनी तेजी से घूम रहा हो। लेकिन अपनी कुछ मान्यताओं के मामले में इस देश का बहुलतावादी समाज अपनी धुरी पर कायम है।

विवाह पूर्व संभोग और कौमार्य पर हाल में संपन्न इस देशव्यापी सर्वेक्षण में बड़े ही रोचक तथ्य उभर कर सामने आए हैं। मसलन भारतीय समाज में शादी से पूर्व यौन संबंध क्या अब भी वर्जित है या इसे अब स्वीकृति मिलने लगी है? इस सवाल के जवाब में 10 में से 7 लोगों ने कहा कि शादी से पहले यौन संबंध अब भी अनुचित है। पूर्वी, मध्य और दक्षिणी भारत के लोगों की बड़ी तादाद इस जवाब के पक्ष में है। छोटे शहर और बुजुर्ग तबका मजबूती से इस भावना के पक्ष में हैं कि विवाहपूर्व यौन संबंध एकदम गलत चीज है, जबकि 24 फीसदी लोगों का कहना है कि धीरे-धीरे ऐसे बदलाव को मान्यता मिल रही है।

शादी से पहले कौमार्य परीक्षण की अनिवार्यता से जुड़े एक अन्य सवाल के जवाब में 71 फीसदी लोगों का जवाब ना में था, जबकि केवल 29 फीसदी परीक्षण के पक्ष में थे। हालांकि आश्चर्यजनक रूप से महानगरों और पश्चिम भारत के अधिकांश लोग इस मत के दिखे कि शादी से पहले कौमार्य परीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए।

क्या शादी से पहले महिला के कुंवारेपन का प्रमाण आपके लिए बहुत मायने रखता है? इसके जवाब में मात्र 37 फीसदी लोगों ने हां में जवाब देते हुए कहा कि कुंवारेपन का प्रमाण शादीशुदा जिंदगी के लिहाज से उनके लिए बहुत मायने रखता है। वैसे, इस मसले पर भी महानगरों और पश्चिमी भारत के निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्ग के लोगों की तादाद बड़ी थी।

क्या अत्यधिक शारीरिक श्रम से किसी लड़की का कौमार्य भंग (कौमार्य झिल्ली टूटना) हो सकता है? इसके जवाब में ज्यादातर लोगों (71 फीसदी) का मत था कि यह कारण कौमार्य भंग होने की निशानी नहीं है। इस मामले में बाकी क्षेत्रों के लोगों के मुकाबले पश्चिमी क्षेत्र के लोग ज्यादा मुखर और जागरूक थे।

कुल मिलाकर कहें तो शादी से पहले शारीरिक संबंध पर अब भी समाज का क्रोधी तेवर ही नजर आता है। जैसी की अपेक्षा थी यह बड़े शहरों और वृद्धों के मुकाबले छोटे शहरों के लिए एक बड़ा मसला है। पश्चिमी और दक्षिणी भारत के लोग इस मुद्दे पर कहीं ज्यादा दकियानूस हैं।

भारतीय समाज में महिलाओं के लिए कौमार्य अब भी महत्वपूर्ण है लेकिन समाज के सख्त नैतिकतावादी रवैये से जुड़ा एक भावनात्मक पक्ष यह भी है कि इस बहुलतावादी देश में अधिसंख्य लोग कौमार्य परीक्षण के खिलाफ हैं। इसके साथ ही आबादी का एक बड़ा भाग इस बात से भी वाकिफ है कि 'कौमार्य परीक्षण' इस बात की गारंटी नहीं है कि लड़की कुंवारी है या नहीं।

 

शादी से पहले यौन संबंध अब भी अनुचित हैं या इसे मान्यता मिलने लगी है?  {अनुचित-70%}     

क्या शादी से पहले महिला के कुंवारेपन का प्रमाण आपके लिए बहुत मायने रखता है?
{हां-37%}


क्या अत्यधिक मेहनत करने से किसी लड़की का कौमार्य भंग हो सकता है?
{हां- 29%},  {नहीं- 71%}

 

निष्कर्ष- मोटे तौर पर देखा जाए तो भारतीय समाज में कौमार्य को अब भी श्रम या किसी अन्य वजह की बजाय सिर्फ शारीरिक संबधों के आइने में ही परिभाषित किया जाता है। इस प्रश्न पर पश्चिमी भारत के लोग ज्यादा मुखर और जागरूक दिखे।

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