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विवाहित पुरुष से विवाह के आधार पर विधवा की सेवा से बर्खास्तगी अवैध

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि यदि विधवा सहायक उपनिरीक्षक पुलिस किसी शादीशुदा सहकर्मी से विवाह कर लेती है तब इस आधार पर उसको सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। हिन्दू विवाह अधिनियम के प्रावधानों के तहत ऐसी शादी शून्य होती है जो अपराध नहीं है।

अत: उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली 1956 के नियम 29 के अन्तर्गत उसे हल्के दण्ड दिए जा सकते हैं। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे में जब विधवा को इस बात की जानकारी ही न हो कि जिससे वह विवाह करने जा रही है वह विवाहित है एवं उसकी पहली पत्नी जीवित है तब उसके लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति राकेश शर्मा ने याची बुलन्दशहर की श्रीमती राजबाला शर्मा की बर्खास्तगी सम्बन्धी आदेश को रद करते हुए पारित किया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि राज्य सरकार चाहे तब वह याची को नियमानुसार छोटा दण्ड दे सकती है। याचिका के अनुसार याची का पति पुलिस विभाग में कार्यरत था। उसकी मृत्यु के पश्चात आश्रित कोटे के अन्तर्गत याची की कान्स्टेबिल पद पर नियुक्ति की गई थी। उसके दो बच्चे भी हैं। बाद में उसकी प्रोन्नति सहायक उप निरीक्षक पद पर की गई थी। इस बीच उसका सहकर्मी अजीत सिंह ने उसकी काफी मदद की एवं दोनों ने विवाह कर लिया।

याची की सेवाएँ इस आधार पर समाप्त कर दी गईं कि उसने ऐसे व्यक्ति से विवाह किया है जिसकी पहली पत्नी जीवित है। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने याची की सेवा समाप्ति सम्बन्धी आदेश को रद करते हुए कहा है कि युवा विधवा का सहकर्मी द्वारा लगातार मदद करने से उसके प्रति लगाव होना स्वाभाविक है, ऐसे में यदि विधवा अपने सहकर्मी का हाथ पकड़ लेती है तब वह अपराध नहीं है।

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  • Web Title:शादीशुदा सहकर्मी से विवाह अपराध नहीं; न्यायालय