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अगर पसंद नहीं तो मत देखो

टीवी पर रियलिटी शो के नाम पर या किसी विज्ञापन में अश्लीलता का भौंडा नाच हो रहा है। और कई लोग अखबार द्वारा सरकार को इसे बंद करने की सलाह दे रहे हैं। लोग सलाह सरकार को दे रहे हैं, खुद को क्यों नहीं देते कि ऐसे शो या विज्ञापन नहीं देखें? किसी भी समझदार डॉक्टर से पूछिए, कहेगा कि विवाहित जीवन में या विवाह के बाद सेक्स सुखी जीवन का अंग है। पर यही सवाल हर किसी के सामने किया जाए, इसकी सलाह शायद ही कोई दे। अगर जनता सचेत है तो जिस वस्तु का विज्ञापन या शो उन्हें अश्लील नजर आता है, वह शो मत देखें या वह वस्तु मत खरीदें। शो की टीआरपी अपने आप कम होगी और वह वस्तु ज्यादा नहीं बिकेगी। नहीं बिकेगी तो विज्ञापन अपने आप बंद हो जाएगा। जरूरत जगृति की है।

जगदीश कुमार खन्ना, नई दिल्ली

ऐ भाई, ये कुर्सी भी न..

बनाने वाले तूने भी ये कुर्सी क्या चीज बनाई। मनुष्य मृत्युपर्यन्त इसे छोड़ना ही नहीं चाहता। जॉर्ज फर्नाडीस को ही लो। लोकसभा का टिकट नहीं मिला तो विद्रोही उम्मीदवार के रूप में ही चुनाव लड़ा और हार गए। चैन फिर भी नहीं आया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश को रहम आया तो उन्होंने उन्हें राज्यसभा में मनोनीत करा दिया। अब यह हार का गम था या उम्र का तकाजा कि वे शपथ करने के लिए सदन तक चल नहीं पा रहे थे। जैसे-तैसे दूसरों का सहारा लेकर वहां तक पहुंचे भी तो शपथ लेने के समय जुबान साथ नहीं दे रही थी और हालत तो तब और गंभीर लगी, जब उन्होंने लोगों को पहचानने में भी असमर्थता जाहिर कर दी। ऐसे नेता देश का क्या भला करेंगे, सिवाय इसके कि अपनी बीमारी का सारा खर्च एमपी के रूप में सरकार से वसूले। वह तो देश पर बोझ हुआ। ऐसे नेताओं को जबरन रिटायर कर दिया जाना चाहिए।

इन्द्र सिंह धिगान,  दिल्ली

कुछ भी मुफ्त नहीं होता

वर्तमान में विभिन्न मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों में एक बेहतरीन चलन देखा जा रहा है। ये कंपनियां ग्राहकों से शुल्क लेकर भी ग्राहकों को मुफ्तखोर साबित करने पर तुली हैं। कंपनियों द्वारा कुछ इस तरह का मैसेज मोबाइल पर भेज जाता है- 100 रु. से रीचार्ज करें और पाएं 100 मिनट मुफ्त, 40 रु. से रीचार्ज करें और पाएं 100 एसएमएस मुफ्त। यह तो ऐसा ही हुआ कि कोई दुकानदार कहे, ‘28 रुपए लाओ और पाओ एक किलो चीनी मुफ्त।’

शलेश कुमार, नेहरू विहार, दिल्ली

हमारी बेड़ियां

मैं तू बन जाऊं, तू मैं बन जाए
मैं तन बन जाऊं, तू मन बन जाए
ताकि बाद में कोई यह न कह पाए
मैं कोई और, और तू कोई और।
मशहूर चिंतक डाइसाक इकेडा का कहना है कि विधाता ने मानव शरीर को अपने स्वरूप में इसलिए रचा ताकि वह पृथ्वी पर सभी जीव-जंतुओं के बीच सृजनात्मक सह-अस्तित्व और अंत:संबंधों को बढ़ावा देगा। अगर यह सही है कि एक ही दिव्य ज्योति सब में प्रकाशमान है तो क्या कारण कि आज का मानव, मत/पंथ/संप्रदाय की कट्टर बेड़ियों के सामने असहाय है।

डॉ. आर. के. मल्होत्रा, नई दिल्ली

चावल वाले बाबा की जय

छत्तीसगढ़ में एक रुपए किलो चावल से निर्धनों को दी जा रही कथित राहत, सौ रुपए किलो दाल से बेशक खत्म हो रही है। स्थिति चाहे जो भी हो बहरहाल, चावल वाले बाबा की जय हो।

विजय लोढ़ा, रायपुर, छत्तीसगढ़

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