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स्वाइन फ्लू से ज्यादा तबाही फैला रही इंसेफेलाइटिस


देश में करीब एक हजार लोगों को पीड़ित और सात लोगों की जान लेने वाले रोग स्वाइन फ्लू पर देश, सरकार और मीडिया में ऐसा हंगामा मचा है गोया जलजला आने ही वाला है जबकि केवल पूर्वांचल में महज बीते सात माह में 600 लोगों को पीड़ित और 140 लोगों की जान लेने वाली इंसेफेलाइटिस की महामारी पर कहीं चर्चा तक नहीं। कारण बस यही है कि स्वाइन फ्लू शहरी बीमारी है जबकि इंसेफेलाइटिस गाँव-देहात के गरीबों को निगलने वाली बीमारी।

दोनों रोगों के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए केन्द्र और प्रदेश सरकार जिस तरह चिंतित और प्रयासरत हैं उससे साफ है कि जान-जान में फर्क किया जा रहा है। चूँकि स्वाइन फ्लू से बड़े-बड़े नेताओं, नौकरशाहों, धन्नासेठों और राष्ट्रीय स्तर के पत्रकारों तथा उनके परिवार के सदस्यों के पीड़ित हो जाने का अंदेशा है इसलिए उससे निपटने के लिए सरकारें बेहद चिंतित नजर आ रही हैं। जहाँ रोग का नामोनिशान तक नहीं है वहाँ भी आइसोलेशन वार्ड बन रहे, प्रोटेक्शन किट की माँग की जा रही और दवाएँ तो पहले से रख ली गई हैं।

विदेशी पर्यटकों की जाँच की जा रही है। नेशनल मीडिया सरकार पर दबाव बनाते हुए इस रोग के हर पहलू और बचाव के उपायों पर विस्तार से बता रहा है। स्वास्थ्य मंत्री खुद भी आनलाइन हैं। लोगों को आश्वस्त किया जा रहा है कि वे डरें मत, सरकार इस फ्लू से लड़ रही है।

दूसरी ओर इंसेफेलाइटिस नाम की बीमारी है जो गाँव-देहात में होती है। गाँव ऐसे जहाँ जलजमाव, चारों ओर गंदगी, धान के खेतों में पानी, मच्छरों की बहुतायत और सुअरों का स्वतंत्र विचरण होता हो तथा लोगों के पास अपना तन ढँकने के लिए कपड़े का इंतजाम करने की हैसियत न हो। यह बीमारी बड़ों से अधिक 15 साल उम्र तक के बच्चों पर प्राणघातक हमला करती है।

पहले यह जापानी इंसेफेलाइटिस कहलाती थी। 1979 से 2005 तक इसने वह तबाही मचाई कि गाँव-गाँव में इसका खौफ व्याप गया। हजारों मासूम बच्चों की जान चली जाने और 2005 में भयानक प्रकोप होने के बाद केन्द्र और प्रदेश सरकार की समझ में आया कि इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए। विशेषज्ञ वर्षो से रट लगा रहे थे कि टीकाकरण से ही यह काबू में आएगी मगर टीकाकरण का निर्णय लेने में दोनों सरकारों को 26 साल लग गए। लेकिन नेशनल मीडिया ने इस महामारी को तनिक भी जगह या तवज्जो नहीं दी।

टीकाकरण ने इस महामारी पर प्रभावी अंकुश लगाया मगर तत्काल से ही दूसरी महामारी शुरू हो गई। इसे कभी वायरल इंसेफेलाइटिस (वीई) कहा गया तो अब एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिण्ड्रोम (एईएस) कहा जा रहा है। एईएस के विषाणुओं के लिए वह क्षेत्र बहुत अनुकूल होता है जहाँ स्वच्छ पेयजल व स्वच्छ शौचालय का अभाव हो, लोग खुले में शौच करते हों और सफाई के प्रति बेहद लापरवाह हों। सफाई के प्रति लापरवाही से एईएस के विषाणु मनुष्य विशेष कर बच्चों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

घोर गरीबी, सर्वाधिक आबादी घनत्व, पिछड़ेपन, अशिक्षा और अंधविश्वासों के मकड़जाल में उलझ पूर्वाचल दुर्भाग्य से ऐसा ही क्षेत्र है। गरीबी के कारण श्रम पलायन आज तक नहीं थमा। दयनीय स्थिति ऐसी कि ज्यादातर लोग अधनंगे ही रहते हैं। बेहद कुपोषित शरीर किसी भी रोग की चपेट में आते ही अधमरा हो जाता है। पास में पैसे इतने ही कि या तो रोटी का इंतजाम करे या दवा का। एक अधिकारी के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकतम 30-40 प्रतिशत घरों में ही स्वच्छ शौचालय हैं। बाकी लोग खुले में शौच करते हैं। स्वच्छ पेयजल का आलम यह है कि इण्डिया मार्क टू का पानी जानवर पीते हैं और ज्यादातर लोग साधारण हैण्डपम्प के प्रदूषित जल का ही सेवन करते हैं।

सूचना अधिकार के तहत मिली जानकारी के अनुसार जेई, वीई या एईएस से वर्ष 2001 से 2008 के बीच देश के 16 राज्यों में 22480 लोग पीड़ित हुए, जिनमें से 5464 लोगों की जान चली गई। औसत प्रतिदिन दो मौत का है। उत्तरप्रदेश में यह आंकड़ा क्रमश: 14754 और 3589 है। केवल बीआरडी मेडिकल कालेज गोरखपुर में एक जनवरी 09 से 10 अगस्त 09 के बीच कुल 596 लोग भर्ती हुए, जिनमें से 140 लोगों की जान चली गई। जबकि वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आरएन सिंह का दावा है कि इंसेफेलाइटिस केवल पूर्वांचल में अब तक 50 हजार से अधिक लोगों की जान ले चुकी है।

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  • Web Title:शहरी रोग पर हाय तौबा, गँवई महामारी पर खामोशी