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ब्लॉग वार्ता : आदिवासी अफसर की बात

अब आदिवासी लोकगीतों में मारुति कार, मोबाइल, ट्रैक्टर, कूलर और टीवी भी आने लगे हैं। कम्प्यूटर भी आयेगा। ग्लोबलाइजेशन के बारे में जितनी सतही जानकारियां आदिवासियों को मिलेगी, वे अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में उसे शामिल करते रहेंगे। एक आदिवासी ब्लॉगर बन गया है। भीतर से बदल रहे समाज को बाहर ला रहा है। अपने समय में सारी बहस अनुसूचित जाति के बदलावों को लेकर होती है। आदिवासी समाज को लेकर होने वाली बहसें नक्सलवाद और भूमि अधिकार तक ही सीमित रह जाती हैं। समाज दिखता ही नहीं हैं। जयपुर के हरि राम मीणा अब ये काम कर रहे हैं।

http://harirammeena.blogspot.com क्लिक करते ही उनका ब्लॉग आदिवासी जगत खुल जाता है। पेशे से सीनीयर पुलिस अफसर हरि राम ग्लोबलाइजेशन को लेकर सवाल करते हैं। पूछते हैं कि ग्लोबलाइजेशन के लाभ (अगर आमजन के लिए हैं तो) उनके जीवन का हिस्सा कब बनेंगे?

यहां से बहस करने वाले प्रवेश कर सकते हैं। पूछ सकते हैं कि आईपीएस अफसर हरि राम मीणा कहीं बाहर से तो अपने समाज को नहीं देख रहे। लेकिन इस ब्लॉग को पढ़ते वक्त कई बातें साफ होते चलती हैं। जब वो कहते हैं कि हिंदुत्व के असर के कारण आदिवासी समाज में बाल विवाह शुरू हो गया। मुख्य धारा के हिन्दुओं को मॉडल माने जाने से आदिवासी समाज हीन भावना का शिकार होने लगा है। सिर्फ हिन्दुत्व ही नहीं, आदिवासी समाज को बदलने की होड़ में लगे मिशनरियों पर भी सवाल खड़े किये गए हैं। एक ब्रिटिश नेतृत्व विज्ञानी वेरियन एल्विन के हवाले से कहते हैं कि मिशनरियों की आदिवासियों के प्रति असहिष्णुता की वजह से बहुत सारे अच्छे सामाजिक रीति-रिवाज खत्म हो गए। यहां तक कि नृत्य, गीत और तांत बुनाई जैसी सामाजिक आर्थिक क्रियाएं लुप्त हो गईं।

हरि राम मीणा अपने चश्मे से आदिवासी समाज को देख रहे हैं। बताते हैं कि मध्यप्रदेश में वन संरक्षण अधिनियम के तहत आदिवासियों पर कई तरह की रोक लगी। उन्होंने विरोध किया कि महाल नाम के पेड़ से वे रस्सी बनाकर जीवनयापन करते हैं। अगर महाल के पेड़ को समय पर नहीं काटा गया तो इसके तने आस-पास के पेड़ों को जकड़ कर बर्बाद कर देंगे। जाहिर है, हम न पेड़ों के बारे में जानते हैं और न आदिवासी समाज के बारे में। एक विद्वान निर्मल कुमार बोस का हवाला देते हुए कहते हैं कि औद्योगिक समाज को समझना आसान है, लेकिन उसके पूर्व के समाज को समझना काफी मुश्किल।

मीणा आदिवासी समाज के ज्ञान भंडार को डिजिटल शब्दों के साथ साइबर संसार में फैलाना चाहते हैं। कहते हैं कि आदिवासी गल्प, स्वप्न, मुहावरे आदि की जानकारियां आदिवासियों की नई पीढ़ी और गैर आदिवासियों को भी मिलनी चाहिए।

शुरू में ग्लोबलाइजेशन पर हीरा राम मीणा की लाइन अलग राय पैदा करती है। लेकिन आगे लिखते हैं कि जिस ग्लोबल विलेज को आदर्श रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वह ऐसा विकसित आदिवासी गांव नहीं होगा, जहां जंगल के प्रति व मानवेत्तर प्राणीजगत का सह अस्तित्व और भावनात्मक संबंध दिखेंगे। इस तरह के ग्लोबल विलेज से आदिवासी निकाल दिया जाएगा और अछूत बना दिया जाएगा। कहते हैं दुनिया पर्यावरण को लेकर चिंतित है, मगर इस चिंता की दुकानदारी हो रही है। किसी ने आदिवासी समाज से प्रेरणा लेने की कोशिश नहीं की। आज भी अंडमान के जारवा और सेंटेनली प्रकृति के हिसाब से जीते हैं। जो ज्यादा है उसे इस्तेमाल करते हैं और जो कम है उसका संरक्षण करते हैं। जैसे हिरण कम हैं तो कहते हैं नहीं मारना है। हिरण में मृत आत्माओं का वास होता है। सूअर ज्यादा है तो उसे खाते हैं। नीले रंग की स्टार फिश कम है तो उसमें मां परी का रूप देखते हैं और नहीं खाते हैं। प्रकृति के सगे हैं ये। यह भी आदिवासी समाज से सीखा जा सकता है।

लेकिन हम सीखने की बजाय उनका प्रदर्शन करते हैं। स्वागत समारोहों और होटलों के पोर्टिको में आदिवासियों को खड़ा कर उन्हें शो पीस बना दिया जाता है। उनके मुद्दे मुख्यधारा में आ ही नहीं पाते। इसलिए कुछ साल पहले वे हफ्तों पैदल चल कर दिल्ली आ गए भू अधिकार कानून को लागू कराने के लिए। कहते हैं आदिवासी इलाकों में काम करने वाले ज्यादातर एनजीओ फर्जी हैं। महाश्वेता देवी जैसी कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कोई विशेष प्रयास नहीं कर रहा। हरि राम मीणा ने अभी शुरुआत की है। उम्मीद है वे आदिवासी समाज के हर छोटे मोटे बदलावों को सामने लायेंगे। पता तो चले कि आरक्षण के इतने सालों बाद आदिवासी समाज का कोई मध्यमवर्ग बन पाया या नहीं, आदिवासी समाज का अपना नेतृत्व कैसा है और भीतर-भीतर क्या नया घट रहा है।

ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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