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सामने का सच

भारतीय समाज अंतर्विरोधों से भरा है, क्योंकि हम ऐसे ही हैं। एक ओर हम विदेशी संस्कृति से अपनी संस्कृति को बचाकर रखना चाहते हैं, तो दूसरी ओर उसी को पूरी तरह अपनाने में अपना गौरव समझते हैं। वेलेंटाइन डे और पबिंग के खिलाफ हथियार भांजते हैं, तो दूसरी ओर गे संबंधों, लिव इन रिलेशनशिप आदि का जोर-शोर से स्वागत करते हैं। विदेशी प्रभाव को अपनाकर अपनी आधुनिकता का प्रमाण देने वाले अपने बुजुर्गो से कतराते हैं, बच्चों से डरते हैं, देर रात तक बार में लड़कियों को साकी के रूप में देखने या छेड़खानी करने में नहीं हिचकिचाते हैं, पर सच का सामना जैसे सीरियल को संस्कृति के लिए घातक मानते हैं। 21वीं सदी के ये लोग गोत्र एक होने पर या प्रेम विवाह करने पर हत्या करने में अपना बड़प्पन कैसे समझते हैं? क्या इससे संस्कृति को मान मिल सकता है?

भारतीय संस्कृति सबसे पुरातन मानी जाती है। युगों से विदेशी हमलावर आते रहे, लूटपाट करते रहे, पर संस्कृति वैसी ही जीवित है। तो क्या ये अस्थायी बदलाव, आते-जाते आधा घंटे के प्रोग्राम उसे तोड़ सकते हैं? रही बात बच्चों की, तो आज के जागरूक वातावरण में पलने वाली हमारी संतान इतनी कमजोर नहीं है कि औरों की गलतियां उन्हें गलत राह पर ले जा सके, बल्कि वे उन पर तरस खाएंगे।

हमारी शक्ति हमारी संस्कृति और दर्शन है, जो हमें गुमराह होने से बचाता है, हमें चित्त की चंचलता से सचेत रहना सिखाता है। औरों के दोषों की चर्चा में स्वाद लेने की जगह अपने मन को स्वस्थ रखने की चेष्टा ज्यादा जरूरी है। किसी गलत चीज से छुटकारा पाना चाहते हैं तो उसकी चर्चा करके उसे जीवनदान मत दीजिए। आपकी उपेक्षा उसे बिना किसी चीज के यूं ही मार देगी। इसके अलावा अपने मन को स्वस्थ रखने की चेष्टा ज्यादा जरूरी है। स्वयं पर नियंत्रण हमें आसानी से दूसरे दुष्प्रभावों से बचाएगा। हमारी संतान पहले हमसे सीखेगी, बाद में किसी और से।

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