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संबंधों की हॉटलाइन

जहां तक राजनय का मामला है, भारत और चीन दोनों ही परिपक्व देश हैं। तमाम असहमतियों और उलझनों के बीच अभी भी वे बार-बार सुलह वार्ताओं के लिए बैठते हैं। दोनों तरफ ही अभी भी उम्मीदें बची हुई हैं कि मसलों को आपसी बातचीत से सुलझा लिया जाएगा। पिछले कुछ साल में एक धारणा तो यह बनी ही है कि अब दोनों देशों के बीच 1962 जैसी युद्ध की गलती दोहराने की कोई आशंका नहीं है। इसलिए नौसेना अध्यक्ष एडमिरल सुरीश मेहता जब यह कहते हैं कि भारत को चीन से टकराव की नहीं सहयोग की नीति अपनानी चाहिए तो एक तरह से वे इसी परिपक्वता को एक विस्तार दे रहे होते हैं। भारत और चीन के बीच तमाम सीमा विवादों के बावजूद दोनों देश एक दूसरे के वैसे दुश्मन नहीं हैं, जैसे भारत-पाकिस्तान। यह जरूर है कि आर्थिक मामलों में दोनों एक दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं और अर्थक्षेत्र की यह लड़ाई युद्ध क्षेत्र की लड़ाई में न बदले इतनी समझदारी तो दोनों को बनाए रखनी होगी। यह भी सच है कि दोनों के बीच अविश्वास इतने गहरे हैं कि आपसी सुलह वार्ताओं में प्रगति बहुत धीमी होती है। पिछले सप्ताह हुई वार्ता का नतीजा बस इतना भर था कि नई दिल्ली और बीजिंग के बीच हॉटलाइन लगाने का फैसला भर हो सका।

यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि चीन के अपने पूर्वाग्रह हैं और भारत को हमेशा यह लगता है कि चीन तमाम तरह से उसे नीचे दिखाने की कोशिश करता है। वह अरुणाचल प्रदेश की योजनाओं में एशियन डेवलपमेंट बैंक के निवेश का जबरदस्त विरोध करता है, या फिर भारत जब जैश-ए-मुहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने की मांग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् से करता है तो वह पाकिस्तान का साथ देता है। या फिर जब दोनों वार्ता के लिए बैठते हैं तो नेपाल के चीन समर्थक पुष्प कमल दहाल प्रचंड यह बयान दे देते हैं कि भारत और अमेरिका ने उन्हें चीन पर हमले के लिए उकसाया था। या एक चीनी विशेषज्ञ यह लिखते हैं कि भारत को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने की कोशिश की जानी चाहिए। इस तरह की कोशिशों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन वे जिस स्तर पर होती हैं उनका जवाब भी उसी स्तर पर देना होगा। लेकिन साथ ही यह भी देखना होगा कि इन सबका असर आपसी समझौता वार्ताओं पर न पड़े। भारत और चीन वे देश हैं, जहां दुनिया की 40 फीसदी आबादी रहती है, दोनों के रिश्तों का सामान्य रहना पूरी दुनिया के लिए जरूरी है।

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