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सूखे का दायरा

वैश्विक मंदी की समस्या को झेल लेने वाला भारत अगर सूखे की समस्या का ठीक से सामना नहीं कर पाया तो यही कहा जाएगा कि आसमान से गिरे खजूर पर अटके। हालांकि विकसित देशों ने मंदी से उबरने के संकेत देकर मंदी और सूखे की दोहरी मार को इकहरा कर दिया है। सूखा और फिर कुछ राज्यों में चुनाव के मद्देनजर केंद्र सरकार और राज्यों के शासक दलों के भीतर चिंता है तो गांवों में इसका विपरीत असर दिखने लगा है। आंध्र प्रदेश, विदर्भ और बुंदेलखंड जैसे इलाकों से किसानों के आत्महत्या की खबरें आने लगी हैं, वहीं राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के चलते गांवों से रुका हुआ पलायन फिर तेज हो सकता है। प्रधानमंत्री ने महंगे खाद्य पदार्थो के दाम और बढ़ने का अनुमान जता कर लोगों की ¨चता इधर कुछ और बढ़ा दी है। सूखे का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि प्रधानमंत्री ने पिछले हफ्ते देश के 141 जिलों को सूखाग्रस्त कहा था तो वित्तमंत्री ने मंगलवार को 161 जिलों को सूखे की तरफ बढ़ते हुए बताया है। सूखे से सिर्फ गांव और किसान प्रभावित होंगे ऐसा नहीं। सूखा हमारी संपूर्ण अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य को प्रभावित किए बिना नहीं रहेगा। इसीलिए पहले से ही कम हो रही जीडीपी की वृद्धि दर में एक प्रतिशत और कमी होने का अनुमान लगाया जा रहा है। गांवों में औद्योगिक उत्पादों की मांग घटेगी और आसमान चढ़ी महंगाई सातवें आसमान पर चली जाए तो आश्चर्य नहीं। लेकिन यह एक मौका भी है, सरकार की प्रबंधकीय क्षमताओं को जांचने और सिंचाई से लेकर खेती के अन्य ढांचागत विकास और दलहन-तिलहन जैसी फसलों के चक्र को नियमित करने के बारे में सोचने का।

प्रधानमंत्री ने 21 अगस्त को मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई है और सरकार ने आपात योजना की तैयारी भी शुरू कर दी है। इस मौके पर खाद्य पदार्थें का निर्यात रोकना, चीनी, चावल और दाल जैसी चीजों का आयात करना, सरकार के अनाज भंडार के एक हिस्से को खुले बाजार में बेचना, वायदा कारोबार पर अंकुश लगाना और जमाखोरों पर सख्ती करने जैसे तमाम कदम शामिल हैं। लेकिन इन कामों में जितनी देरी होगी, संकट का सामना करने में उतनी ही दिक्कत आएगी, क्योंकि दुनिया के बाजार में खाद्यान्न की कीमतें भारत द्वारा अन्न आयात करने की उम्मीद में बढ़ने लगी हैं। सूखे का सामना करने के लिए फौरी और दूरगामी दोनों तरह से उपाय करने होंगे।

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