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प्रकृति का नायाब तोहफा: आर्किड

प्रकृति का नायाब तोहफा: आर्किड

आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व असम के एक चाय बागान का ब्रिटिश मालिक अपना घर बनवाने के लिए लकड़ी कटवाने वहां के घने जंगलों के भीतर घुसा तो चारों ओर ऊपर से नीचे बंदनवार झूलते रंग-बिरंगे फूलों की झलर देख स्तंभित रह गया और बजाय लकड़ी के वह इन फूलों को एकत्रित करने टूट पड़ा। यहीं से यह पुष्प जब इंग्लैंड के क्यू गार्डन में पहुंचा तो वहां तहलका मच गया और पुष्प प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ी। यही नहीं, इसे पाने के लिए पैसों की वर्षा होने लगी। एक जर्मन पुष्प प्रेमी ने तो क्रूरता की सीमा तक इन्हें जंगलों से बटोरा और जिन्हें ले जा नहीं सका, उन्हें नष्ट कर दिया, ताकि कोई और उसे प्राप्त न कर सके।

भोजन की थाली में मीठे में सुगंध देने वाला वनीला अर्थात् आकड की संसार में 740 के लगभग जातियां व 1800 प्रजातियां हैं। गर्म मरुस्थलीय प्रदेशों को छोड़ यह सब जगह पाया जाता है, परन्तु रूप व रंग की विविधता व आकर्षण का जो संग्रह हिमालय क्षेत्र, सिक्किम, नीलगिरी, पश्चिमी घाट व केरल में उपलब्ध होता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं। यह पौधा पराश्रयी तो है, परन्तु परजीवी नहीं। पेड़ के तनों पर अपनी जड़ें फैलाने भर के लिए इसे जगह की आवश्यकता है। अपना भोजन तो यह हवा, नमी व पेड़ की छाल के कड़े गले अंश में से प्राप्त कर लेता है। चीड़, देवदार, यूकेलिप्टिस जैसे तैलीय वृक्षों में आर्किड नहीं होता।

आर्किड दो प्रकार का होता है - 1. एपीफायटिक, जो वृक्षों पर होता है। 2. टेरेस्ट्रियल, जो धरती, पत्थरों के बीच, पानी के किनारे नम जमीन में होता है। आर्किड पौधे की पत्तियां लम्बी व चमड़े जैसी मोटी व चिकनी होती हैं। यही चिकनापन पानी के वाष्पीकरण को रोकता है। रस्सी जैसी मोटी लम्बी जड़ों के ऊपर तने के रूप में एक मोटा कंद जैसा भाग होता है, जो वास्तव में कृत्रिम कंद कहलाता है। यह कंद वास्तव में इसका भोजन भंडार होता है। इसी में पौधे के लिए पानी, स्टार्च व अन्य आवश्यक भोज्य पदार्थ सुरक्षित रहते हैं। इसके फूल में तीन पंखुड़ियां व तीन पाद-पटल होते हैं। सामने के बीच वाली पंखुड़ी अंदर की तरफ घूमी कुछ-कुछ राजस्थानी चमरौधे के जूते सदृश होती है। इसका रंग अन्य पंखुड़ियों के मुकाबले बहुत गहरा व चटक होता है। इसके परागण वाला अंश इसी घूमी हुई पंखुड़ी के बहुत ही भीतर जाकर होता है। इसलिए परागण हवा द्वारा नहीं होता, बल्कि उन विशेष कीट व पतंगों द्वारा होता है, जो मधु व पराग के लोभ में साहस करके इसके भीतर तक केन्द्र भाग में घुस जाते हैं और उनके शरीर व पंखों से जो पराग कण चिपक जाते हैं, वे ही दूसरे फूल के भीतर के पराग कणों से चिपट कर परागण करते हैं। यही कारण है कि आíकड का परागण बहुत कठिनाई से होता है और परागण नहीं हो पाने के कारण इसका फूल बहुत दिनों तक ताजा खिला रहता है। फूल भी लम्बी-लम्बी टहनियों में खिलते हैं और अक्सर एक टहनी में पन्द्रह-बीस दिन तक खिल जाते हैं। कई किस्मों में हल्की सुगन्ध भी होती है। काले रंग को छोड़ कर यह फूल हर रंग, यहां तक कि हरे रंग में भी मिलते हैं।

एपीफायटिक किस्म के पौधे को लगाने के लिए आप आम, शहतूत जैसी खुरदरी छाल वाले किसी भी वृक्ष में गड्ढा करके लगा सकते हैं। यदि वृक्ष नहीं हो तो आप खुरदरी छाल वाली त्वचा के किसी वृक्ष का मोटा व एक फीट से लेकर डेढ़ फीट लम्बा टुकड़ा लेकर उसके बीच इस प्रकार आग लगाएं कि जला हुआ स्थान नाव के समान बन जाए। इसी खोखले स्थान में लकड़ी के कोयले के टुकड़े, स्फेगनम मास मिला कर भरें व उसके ऊपर सावधानीपूर्वक पौधे को संभाल कर रख दें। इसके कंद को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए। अब नारियल की रस्सी लेकर उसे तने से बांध कर किसी ऐसे स्थान पर लटका दें, जहां सुबह की धूप खूब आती हो व हवा का आवागमन भी होता हो। पानी अवश्य देते रहें। शीत तु इनकी सुप्तावस्था होती है। इन दिनों पानी कदापि न दें। खली व गोबर की तरल खाद देते रहें। टेरिस्ट्रियल किस्म के लिए गमले में नीचे ईंट व कोयले के टुकड़े (बादाम के साइज के) भर दें। ऊपर स्फेगनम मास रखकर पौधा जमा दें। इसमें आप पत्ती की खाद भी मिला सकते हैं। मकड़ी, कीट आदि आने पर पोटेशियम के हल्के घोल से पत्ते मुलायम कपड़े से साफ कर दें। फरवरी के अंत में जब कलियां आनी शुरू हो जाती हैं तो खली व गोबर की तरल खाद का हल्का छिड़काव सप्ताह में एक बार अवश्य करें। एक बार फूल खिल जाने पर यह पन्द्रह दिन से तीन सप्ताह तक तरोताजा रहते हैं। केटेलिया, वेन्डा, डन्ड्रोबियम, केटलिया, प्लीओन आदि इसकी अनेक प्रजातियां हैं।

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