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सच का सामना समस्याओं से हो

‘सच का सामना’ सेक्स स्कैंडल और फूहड़ लग रहा है ‘सच का सामना’ ना होकर ‘नंगे होकर जाओ’ लग रहा है। मुझे इस ‘सच का सामना’ में बहुत अधिक संभावनाएं नजर आ रही हैं। यकीन मानिए आपकी सच-झूठ पकड़ने वाली मशीन देश में व्यापक भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त कर सकती है। अदालतों में इतने लंबित मुकदमों का ढे़र लगा पड़ा है, उनका निबटान हो सकता है। ट्रैफिक व्यवस्था सुधर सकती है। बिजली नियमित हो सकती है। महंगाई कम हो सकती है। बेरोजगारी समाप्त हो सकती है। अशिक्षा गरीबी समाप्त हो सकती है। हमें सच में जीना सिखा सकता है यह प्रोग्राम। हमें अपने अंदर झंकना सिखा सकता है सच का सामना। बस गरिमा लाने की जरूरत है। जरा सोचिए।

शिव प्रकाश शर्मा,  हापुड़

इमरान का बयान एक हथकंडा

जनाब इमरान हाशमी को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का एक अच्छा लेकिन ओछा हथकंडा हाथ लग गया। उसने एक शगूफा छोड़ दिया, यह कह कर कि मुंबई में उसे एक सोसायटी ने सिर्फ इसलिए फ्लैट नहीं दिया, क्योंकि वह मुसलमान है। हालांकि अन्य स्थापित मुसलमान अदाकारों ने इस बात का तुरंत खंडन कर दिया कि उन्हें मुसलमान होने के कारण मकान लेने में कभी कोई दिक्कत नहीं आई। सोसायटी वालों का यह कहना कि इमरान ने उन्हें न कभी कोई कागज दिया और न पैसा ही तो फ्लैट न देने की बात कहां से आ गई। अब इमरान के खिलाफ दो समुदायों के बीच नफरत फैलाने का केस भी दर्ज करा दिया गया है।

इन्द्र सिंह धिगान,  दिल्ली

आधे एकड़ पर ट्रैक्टर

हरियाणा विधानसभा ने हरियाणा सहकारी समितियां (संशोधन) विधेयक 2009 पारित करके अब आधा एकड़ के जमीनदार भी, बैंक के पास आधा एकड़ जमीन गिरवी रख कर ट्रैक्टर लोन ले सकेंगे, साथ-साथ गिरवी भूमि पर खेती भी करते रहेंगे। राज्य की प्रगति में हरियाणा विधानसभा का यह स्वागतयोग्य फैसला है। परंतु कुछ शंका भी है, जिस तरह शहरों में गाड़ियों की भरमार हो रही है, उसी तरह हरियाणा के खेतों में भी ट्रैक्टरों की भरमार न हो जाए।

राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

कुत्तों की सरकार

जहां भी देखो, वहीं कुत्ते
हर तरफ है, कुत्तों की भरमार
मेरे यहां से ले जाइए,
अगर हो किसी को दरकार,
कुत्ते ही कुत्ते देख कर
लगता है कुछ ऐसा,
जैसे चल रही कुत्तों की
अलग सरकार।

वीरेन कल्याणी, दिल्ली

भुला दिया है ‘जय किसान’

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था- ‘जय-जवान, जय -किसान’। उनके बाद देश ने कई प्रधानमंत्री देखे, लेकिन किसी में भी किसानों को इतनी अहमियत नहीं दी। शायद यही कारण है कि दिन-प्रतिदिन किसानों के हालात बद से बदतर होते चले गए और बात उनकी आत्महत्या तक जा पहुंची। पंजाब में तो किसानों की आत्महत्या का दौर थमता नजर नहीं आ रहा। कुछ दिन पहले भी संगरूर जिला के सुनाम तहसील में दो किसानों ने बदहाली से तंग आकर जान दे दी। एक ओर हमारी सरकार के विकास के बड़े-बड़े दावे और दूसरी तरफ बेबस किसान। शायद सरकार ने ‘जय किसान’ भुला दिया है..।

रविंदर सिंह, मोहाली

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