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ताकि वह रात फिर न आए

शनिवार की सुबह उत्तराखण्ड के लिए फिर से मातम लेकर आई। गहरी नींद में सो रहे पिथौरागढ़ के तीन गांवों के 43 लोग मलबे में जिंदा दब गए। मुनस्यारी तहसील के ला, पनलिया और रूनीतोला तोक में शनिवार सुबह लगभग ढाई बजे अतिवृष्टि हुई। एक बात बार-बार सुनने को मिलती रही है कि उत्तराखण्ड के आपदा प्रभावित गांवों को चिन्हित किया जाना चाहिए। एक समाचार में इस प्रकार के 97 गांवों को चिन्हित किए जाने की बात की गई है और उनके विस्थापन की मांग भी की जा रही है।

ऐसे हादसे लगातार होते रहे हैं। 18 अगस्त 1998 को माल्पापिथौरागढ़ में दो सौ से ज्यादा लोग तथा रूद्रप्रयाग जिले के उखीमठ तहसील में 103 लोग मारे गए थे, जिसमें भेंटी और पौण्डार गांव एक बड़े भूस्खलन के नीचे दब गए थे। साथ ही इससे पूर्व में 14 गांवों में भी भयंकर तबाही के साथ लोग मारे गए थे।

इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद गोपेश्वरचमोली में रचनात्मक कार्यों की संस्था दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल ने नवम्बर 1998 को बटेर गांव में उत्तराखण्ड में भूस्खलन की त्रासदी पर एक संगोष्ठी आयोजित की थी, जिसमें जमीनी वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी डॉ. आर एस टोलिया और प्रधानमंत्री कार्यालय में सयुक्त सचिव अशोक सैकिया ने भी भाग लिया था। उस गोष्ठी में एक बात उभर कर आयी थी की हिमालय के इन क्षेत्रों का व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कर अति संवेदनशील क्षेत्रों का चिन्हाकंन, मानचित्रीकरण करते हुए एक विस्तृत तालिका तैयार की जाय तथा वसासतों निमार्ण कार्यों, भूमि सहित समस्त प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के लिए व्यवहारिक दिशा-निर्देश तैयार कर उन्हें व्यापक प्रचार प्रसार के साथ स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराया जाय। मैं कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार को भी मिला। उनसे उत्तराखण्ड और हिमांचल के इस प्रकार के क्षेत्र को चिन्हित करने का अनुरोध किया था। इसमें उत्तराखण्ड के संदर्भ में यह भी कहा गया कि काली नदी से टौंस तक का मुख्य केन्द्रीय भ्रंश वाला इलाका है उसके दोनों ओर के बीस-बीस किलोमीटर का क्षेत्र चिन्हित किया जाना चाहिए। जिसमें हाई रेजुलेशन उपग्रह के आकड़ों से इसके अंतर्गत पड़ने वाले जलागमों का सर्वेक्षण करना। साथ ही कुछ खास संवेदनशील जलागमों में पिछले दस सालों में हुए परिवर्तन का उपग्रह के ऑकड़ों से अध्ययन करना, इससे जलागमों में पड़ रहे दबावों का आकलन तथा दबाव कम करने के वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोचा जा सके। इस चर्चा के बाद इसरो के अध्यक्ष डॉ. कस्तूरीरंगन के साथ बैठक हुई थी, इस पर उन्होंनें कार्य करवाने के निर्देश भी दिए। लेकिन नीचे के स्तर पर मुख्य केन्द्रीय भ्रंश के बजाय ऋषिकेश से बद्रीनाथ, ऋषिकेश से गंगोत्री, रूद्रप्रयाग से केदारनाथ, टनकपुर से माल्पा मार्ग को आधार मानकर अध्ययन किया गया। जिसमें देश की बारह वैज्ञानिक संस्थाएं जुटीं थीं। जिसका 2001-02 में मानचित्र तैयार किया गया तथा उत्तराखण्ड के संबंधित अधिकारियों को सौंप दिया गया था।

ऐसा लगा कि किसी ने उसको देखने की जरूरत ही महसूस नहीं की। इधर उत्तरकाशी में वरुणावत पर्वत की त्रासदी हुई। जबकि इस मानचित्र में उत्तरकाशी को चिन्हित किया गया था और प्रबंध के बारे में सुझाव दिए गए थे। लेकिन जैसा कि होता है, हमारे यहां किसी पर जिम्मेदारी सुनिश्चित नहीं की जाती है। बार-बार प्रयास करने पर 2005 में देहरादून में इस मसले पर फिर संगोष्ठी हुई। जिसमें सभी जिलाधिकारी, सीमा सड़क संगठन, सेना आदि के अधिकारी भी उपस्थित थे। इस अध्ययन में मुनस्यारी का यह क्षेत्र शामिल नहीं था।

मध्य हिमालय की अंर्तनिहित संवेदनशीलता जगजाहिर है, भू-गर्भविदों के अनुसार भारतीय भूखण्ड के उत्तरगामी दबाव ने विश्व की इन नवीनतम व उत्तुंग पर्वत श्रंखलाओं को जन्म दिया है, यह उत्तरानुवर्ती दबाव निरन्तर जारी है। जिसमें उत्पन्न उर्जा का उत्सर्जन समय-समय पर भूकंपीय झटकों के रूप में प्रकट होता है। सन 1991 के उत्तरकाशी व सन 1999 के चमोली भूकम्प इसके नवीनतम उदाहरण हैं। इसके अलावा कई छोटे-छोटे भूकम्प इनके बाद भी आए हैं। इस भूगर्भीय प्रक्रिया के कारण विगत 100 वर्षों में आये असंख्य भूकंपीय झटकों ने इस क्षेत्र को अत्यन्त संवेदनशील बना दिया है। प्राकृतिक अस्थिरता के साथ-साथ हमारे दोषपूर्ण विकास योजनाओं, सड़क तंत्र के विस्तार तथा नदियों के जलदोहन की विभिन्न योजनाओं के अलावा वनों के अंधाधुंध व्यापारिक दोहन ने हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र को बुरी तरह गड़बड़ा दिया है। यद्यपि संपूर्ण हिमालयी श्रंखलाओं में भूस्खलन का खतरा बना हुआ है, परन्तु जिन क्षेत्रों से होकर मुख्य भ्रंश गुजरते हैं उन क्षेत्रों में यह स्थिति और भी बदतर हो जाती है। इसी तरह का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, मुख्य केन्द्रीय भ्रंश जो लघु हिमालय को वृहद हिमालय से अलग करता है। संयोगवश यह भ्रंश अत्यन्त घने बसे लघु हिमालय व अत्यन्त विरल जनघनत्व वाले वृहद हिमालय के बीच में स्थित है, जो एक जनसंख्या सीमा का भी कार्य करता है। वर्षों से यह अनुभव किया गया है कि सभी भूकंपों का केन्द्र मुख्य केन्द्रीय भ्रंश के आस-पास ही रहता है।

मैं चालीस सालों से इस इलाके की यात्रा करता रहा हूं। इन चार दशकों में इन त्रासदियों के भुक्तभोगियों और विषय विशेषज्ञों से मेरा निरन्तर संपर्क रहा है। हाल ही में सन 1998 की मानसून में इस क्षेत्र में दो बड़ी आपदाएं पहले से भी ज्यादा भंयकरता से घटित हुईं। काली बेसिन में माल्पा दुर्घटना और मध्यमहेश्वरी बेसिन में उखीमठ के आस-पास की दुर्घटना, ये सभी पणढाल मुख्य केन्द्रीय भ्रंश के आस-पास ही हैं, दुर्भाग्यवश यह जानते हुए भी कि मुख्य केन्द्रीय भ्रंश बार-बार आने वाले भूकंपों का केन्द्र है, हम भूकम्प के झटकों के बाद पणढालों में आये पर्वितनों की स्थिति का आकलन नहीं करते। हालांकि मैं भूवैज्ञानिक नहीं हूं, फिर भी यह मानने में असमर्थ हूं कि किस प्रकार भेंटी, बुरवा (पौण्डार) की तरह का एक पर्वत अग्रभाग अचानक टूट गया, जिससे दो गांव पूरी तरह से दब गए व एक झील बन गई, मेरे विचार में जब तक कोई पूर्व विद्यमान दरार हो, जो किसी भूकंप द्वारा बनी हो- न हो इस तरह का पर्वत अपघटन नहीं हो सकता। छिपे हुए खतरे को तब तक अनुभव नहीं किया जा सकता है जब तक कि वह सहनशीलता की सीमा को पार नहीं कर जाता, इस सहनशीलता की सीमा को कोई नहीं जानता। अत: हमें इस तरह के क्षेत्रों का पहले से पता लगाना होगा और इसे एक आधार बना कर एक पूर्व चेतावनी तंत्र का विकास करना होगा। इससे जान की क्षति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। दूर-संवेदी तकनीक और भूगर्भीय ज्ञान इस कार्य को दक्षतापूर्वक अंजाम दे सकती है।

लेखक प्रसिद्ध पर्यावरणविद् हैं

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