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म्यांमार : चीन का कसता शिकंजा

म्यांमार की विपक्षी नेता आंग सान सू की पर वहां की सैनिक सरकार ने मुकदमा चलाया हुआ है। सू की को कई वर्षो से उनके घर में वहां की निरंकुश सैनिक सरकार ने नजरबंद किया हुआ है। उन्हें किसी से मिलने की इजाजत नहीं है। संयोग से कुछ महीने पहले सू की का एक अमेरिकी प्रशंसक गलती से उनके निवास पर उनसे मिलने चला गया। इसी को बहाना बनाकर म्यांमार की सैनिक सरकार ने सू की पर मुकदमा चला दिया है। सारे संसार के उन देशों में जहां लोकतंत्र की सरकारें हैं, म्यांमार के सैनिक शासकों की इस धूर्ततापूर्ण कार्रवाई की कठोर निंदा हुई है। परन्तु म्यांमार के सैनिक शासक विश्व जनमत की परवाह नहीं करते हैं।

म्यांमार का पुराना नाम बर्मा था। अंग्रेजों ने फौज भेजकर सन 1800 में बर्मा पर कब्जा कर लिया था और उसे ब्रिटिश साम्राज्य का एक भाग बना लिया था। सही अर्थ में बर्मा उन दिनों भारत का ही एक अंग था। 1940 के दशक में बर्मा के लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी आंग सान ने, जो सू की के पिता थे, अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करके बर्मा को आजादी दिलाई थी। लेकिन आंग सान की हत्या कर दी गई। उसके बाद बर्मा जिसका नाम बाद में म्यांमार पड़ा, किसी न किसी रूप में फौजी शासकों के कब्जे में रहा।

सन 1962 में म्यांमार में सेना का शिकंजा बहुत कठोर हो गया। देश की जनता सैनिकों के अत्याचार से कराहने लगी और मांग करने लगी कि देश में लोकतंत्र की स्थापना हो। 1988 में पूरे म्यांमार में छात्रों ने सैनिक सरकार के खिलाफ अनेक प्रदर्शन किए। सरकार ने उसे सख्ती से कुचल दिया और प्रमाणिक जानकारी के अनुसार 3000 से अधिक लोग इन प्रदर्शनों में मारे गए।

सरकार के खिलाफ रोज-रोज के प्रदर्शनों को देखकर सैनिक सरकार ने देश में आम चुनाव की घोषणा की जिसमें सू की की पार्टी ‘नेशनल लीग फार डेमोक्रेसी’ भारी बहुमत से जीत गई। परसैनिक सरकार ने सत्ता सू की और उनके सहयोगियों को हस्तांतरित नहीं की। उसके बदले सू की और उनके सांसद साथियों को जेल में डाल दिया गया। कुछ सांसद साथी भागकर पड़ोसी देशों में, खासकर थाईलैंड चले गए। कुछ भारत भी आ पहुंचे।

फौजी शासन की इस कार्रवाई से नाराज होकर पश्चिम के देशों ने म्यांमार के खिलाफ कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। अमेरिका ने अपने उद्योगपतियों को चेतावनी दे दी कि कोई भी व्यक्ति या कोई भी कंपनी म्यांमार में निवेश नहीं करे। इस तरह का आदेश अमेरिकी सरकार ने 1997 में जारी किया। बुश की सरकार ने म्यांमार पर और भी कठोर आर्थिक पाबंदी लगाई। म्यांमार से अमेरिका आने वाली सभी उपभोक्ता वस्तुओं का आयात पूरी तरह रोक दिया गया। अमेरिकी सरकार का अनुमान था कि इस तरह के आर्थिक प्रतिबंध से म्यांमार की सैनिक सरकार लड़खड़ा जाएगी। वह सू की को रिहा कर देगी और देश में लोकतंत्र की स्थापना हो जाएगी। अमेरिका की देखा-देखी ब्रिटेन तथा यूरोप के अन्य देशों ने भी म्यांमार के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया। प्रतिबंध लगाने के बाद म्यांमार चीन की गोद में जा बैठा। तब से चीन का शिकंजा दिनों दिन म्यांमार पर कसता ही जा रहा है।

जब म्यांमार में सैनिक शासन शुरू हुआ उसके ठीक पहले वहां इतना अधिक चावल उत्पन्न होता था कि उसे ‘एशिया के चावल का कटोरा’ कहा जाता था। परंतु अब ऐसी बात नहीं रही। म्यांमार में प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है। म्यांमार की बहुमूल्य लकड़ी जिसे ‘बर्मा टीक’ कहते हैं, संसार की संभवत: सबसे उम्दा किस्म की लकड़ी है। पश्चिम के समाचारपत्रों के कुछ छिटपुट संवाददाता जो म्यांमार जा पाए हैं उन्होंने यह देखकर दांतों तले उंगली दबा ली है कि प्रतिदिन सैकड़ों ट्रक कीमती ‘बर्मा टीक’ लेकर चीन और दूसरे निकटवर्ती देशों को जा रहे हैं।

बर्मा के अत्यंत ही कीमती जंगलों का बेरहमी से चीन सफाया कर रहा है। म्यांमार मे बहुमूल्य रत्नों का अपार भंडार है। चीन बड़ी बेरहमी से इन रत्नों का खनन करके पानी के भाव अपने देश ले जा रहा है। म्यांमार में प्राकृतिक गैस का भी अकूत भंडार है। चीन की कंपनियों म्यांमार की गैस का दोहन करके कुछ तो अपने देश ले जा रही हैं और कुछ थाईलैंड को बेच रही हैं।

सैनिक शासकों ने म्यांमार को शेष संसार से काटकर अलग-थलग कर लिया है जिसका नतीज यह हुआ है कि म्यांमार की जनता घोर गरीबी और अभाव में अपना जीवन व्यतीत कर रही है। लेकिन फिलहाल उसके इस संकट से उबरने की कोई संभावना नहीं दिख रही।

लेखक पूर्व सांसद और पूर्व राजदूत हैं

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