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सच के स्वरूप

तैतरीय उपनिषद की ‘ब्रह्मनंदवल्ली’ में ब्रह्म को ‘सत्यं’ ज्ञानमन्नत ब्रह्म’ कहा गया है, अर्थात ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अन्नत स्वरूप है। गीता के अनुसार असत्य भाव कहीं विद्यमान नहीं है और ‘सत्य’ का कभी लोप नहीं होता।
‘योग वशिष्ठ’ के ‘स्थिति प्रकरण’ के अनुसार नर वहीं है जिन्हें सत्य का व्यसन हो, अन्य सभी पशु है। ‘महाभारत’ के शांति पर्व में युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए भीष्म पितामह कहते है, ‘सत्य ही धर्म है, सत्य ही तप है, योग और ब्रह्म है। सत्य ही धर्म है और झूठ से बढ़कर पाप नहीं है’। विदुर नीति में कहा गया है कि मनुष्य को छ: चीजें कभी नहीं छोड़नी चाहिए- सत्य, दान, कर्मण्यता, क्षमा, धैर्य और गुणों में दोष न देखने की आदत। कबीरदास जी के लिए तो ‘सांच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप।’

‘विदुर नीति’ कहती है कि बोलने से मौन अच्छा, बोलो तो सत्य, सत्य भी प्रिय और प्रिय सत्य धर्म संगत हो तो सबसे अच्छा। विदुर नीति में ही उल्लेख मिलता है कि वो सभा नहीं, जिसमें बड़े-बूढ़े न हो, जो धर्म की बात न कहे वो बूढ़े नहीं है और जिसमें सत्य नहीं वह धर्म नहीं है, जो कपटपूर्ण हो वो सत्य नहीं है। इस सशर्त सत्य के अतिरिक्त कहीं-कहीं झूठ बोलना भी सत्य के बराबर ही महत्वपूर्ण और उससे भी श्रेष्ठ माना गया है। महाभारत में निर्देश है-

‘भवेत न वक्तव्यं वक्त्रव्यमनृतम भवेत।

जहां झूठ ही सत्य का काम करे अथवा सत्य ही झूठ बन जाए, ऐसे अवसरों पर सत्य नहीं बोलना चाहिए। वहां झूठ बोलना ही उचित है। जैसे कोई लुटेरा आपकी संपत्ति के बारे में जानना चाहता है तो उसे मत बताइये, यदि बिना बोले काम न चले तो झूठ बोलिए। इसी अध्याय में उल्लेख है कि प्राण संकट के समय, कन्या का विवाह करने में, धन की रक्षा के लिए तथा धर्म की रक्षा के लिए झूठ बोला जा सकता है।

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