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प्रेम की प्रतिमा

भारतीय समाज बहुधा और फिर समन्वय के दर्शन के आधार पर सैकड़ों सालों से चल रहा है और आज भी अगर अपने झगड़े मिटाने के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु ईसा पूर्व के कवि तिरुवल्लुवर और सोलहवीं सदी के कवि सर्वज्ञ की मदद ले रहे हैं तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। झगड़े तब होते हैं, जब समाज का कोई हिस्सा अपने क्षेत्रीय स्वार्थ के तहत इतना कट्टर बन जाता है कि उसे न तो दूसरे प्रांत का हित दिखाई देता है और न ही किसी तरह की साझी विरासत। लेकिन इसके विपरीत सद्भाव जगने के साथ झगड़े मिटने भी लगते हैं। भले ही यह कहा जा रहा हो कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदयुरप्पा ने बंगलूर के तमिल मतदाताओं को रिझाने और तमिलनाडु में भाजपा की जड़ें जमाने के लिए 18 साल से विवाद में फंसी तिरुवल्लुवर की प्रतिमा का अनावरण करवाया है, पर प्रेम की डोर पकड़ कर हो रही यह राजनीति स्वागत योग्य है। कावेरी के जल बंटवारे को लेकर पिछले 18 साल से तनाव और दंगों की राजनीति तक पहुंच चुके दोनों राज्य अगर प्रतिमाओं और कविताओं के आलोक में इक्कीसवीं सदी की समस्या हल कर रहे हैं तो इससे राजनीति और अर्थशास्त्र के इस युग में साहित्य और संस्कृति की बड़ी सकारात्मक भूमिका रेखांकित होती है। जिस विवाद को हल करने में विद्वानों की समितियां, पंचाट और सुप्रीम कोर्ट सफल नहीं हो पा रहे थे, उसे अगर जनकवियों की प्रतिमाओं से हल किया जा रहा है तो इसमें जरूर सत्साहित्य और उससे जुड़ी भावना का असर छुपा है। तिरुवल्लुवर तमिल भाषा के ऐसे कवि हैं, जिनके जन्म और पंथ को लेकर कई मत हैं। उन्हें हिंदू और बौद्ध दोनों संप्रदायों में रखा जाता है।

लेकिन एक बात पर सभी एकमत हैं कि उनकी कविताएं लोगों के बीच जन्मगत भेदभाव मिटाने वाली हैं। उसी तरह त्रिपद की रचना करने वाले सर्वज्ञ पिछड़े वर्गो के पक्षधर माने जाते हैं। इसीलिए करुणानिधि और येदयुरप्पा किसानों से विवाद भुला कर कांस्य की इन प्रतिमाओं से प्रेम सीखने की सलाह दे सके। इससे उन राजनेताओं और आंदोलनों को सबक लेना चाहिए, जो तमाम सौंदर्यबोध और सामाजिक सद्भाव को ताक पर रख कर ताबड़तोड़ मूर्तियों की स्थापना की नकारात्मक राजनीति चलाते हैं। मूर्तियां रचनात्मकता और मानवता के महान मूल्यों की वाहक होती हैं। उन्हें क्षुद्र राजनीति का विजय-स्तंभ बनाने से बचना चाहिए।

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  • Web Title:प्रेम की प्रतिमा