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आतंक का खेल

अंग्रेज खिलाड़ियों ने अंतिम समय में विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप से हटने का फैसला जो किया है, उससे चैंपियनशिप पर तो खास असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे कई सवाल खड़े हो गए हैं। असर इसलिए खास नहीं होगा, क्योंकि इस टूर्नामेंट की वरीयता सूची में कोई अंग्रेज खिलाड़ी नहीं है, लेकिन जो सवाल खड़े हुए हैं, उनका जवाब ढूंढा जाना चाहिए। विश्व चैंपियनशिप की बैडमिंटन के संदर्भ में बहुत बड़ी प्रतिष्ठा है और अगर अंग्रेज खिलाड़ी इससे हट गए हैं तो यह मानना चाहिए कि वे सचमुच असुरक्षित महसूस कर रहे थे। महत्वपूर्ण यह भी है कि इंग्लैंड के बैडमिंटन फेडरेशन ने अपने तई यह फैसला किया है और वहां का विदेश विभाग या सरकार के दूसरे अंग इस फैसले में शामिल नहीं थे, यानी यह अंग्रेज सरकार का फैसला नहीं है। हमारे लिए सोचने की बात यह भी है कि अगले साल दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं और इंग्लैंड में इस पर भी सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। म्यूनिख ओलंपिक में इजराइली खिलाड़ियों पर आतंकवादी हमले के बाद खेल स्पर्धाओं और खिलाड़ियों की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा बन गया है और सुरक्षा की वजह से इस या उस देश के खिलाड़ियों का किसी देश में न जाना लगातार सुर्खियों में रहता है। हमने भी मुंबई पर आतंकवादी हमले के मद्देनजर भारतीय क्रिकेट टीम का पाकिस्तान दौरा रद्द किया था और हमारे बदले पाकिस्तान गई श्रीलंकाई टीम पर आतंकवादियों ने हमला किया था। क्या ऐसे में यह ठीक न होगा कि तमाम देश मिल कर खेल स्पर्धाओं की सुरक्षा को लेकर कुछ नीतियां और मानक बनाएं और अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में उन नीतियों और मानकों को लागू किया जाए। एक अंतरराष्ट्रीय टीम ऐसी हर स्पर्धा के सुरक्षा इंतजमों की निगरानी करे और अगर वह टीम संतुष्ट हो तो फिर कोई देश उस स्पर्धा से सुरक्षा कारणों से बाहर न रहे। अभी स्थिति यह है कि एक फेडरेशन या कुछ खिलाड़ी भी ऐसा फैसला कर लेते हैं और किसी स्पर्धा या किसी देश की प्रतिष्ठा को संदेहास्पद बना देते हैं। आतंकवाद का दैत्य अभी जल्दी से दुनिया से जाने वाला नहीं है, अगर हम नहीं चाहते कि हमारे खेल उसके बंधक बन जाएं तो सारे देशों को मिल जुल कर कोई रणनीति बनानी चाहिए।

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