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बच्चों के मुताबिक बनाइए: पैरेंटिंग का रास्ता

बच्चों के मुताबिक बनाइए: पैरेंटिंग का रास्ता

किंग खान शाहरुख खान के बारे में मशहूर है कि वह अपने मोबाइल पर कॉल्स नहीं उठाते-महज अपने लाडले आर्यन की कॉल्स के सिवाए! उधर हैंडसम सिंगर शान उर्फ शांतनु मुखर्जी और उसकी पत्नी राधिका एकदम फोकस्ड और तवज्जोदार पैरेंट्स हैं। बेटे सोहम के आगमन से पहले ही राधिका ने स्विस एयर में एयर होस्टेस का जॉब छोड़ दिया। गर्भावस्था के दौरान, वह जन्म और शिशुओं से जुड़ी किताबें पढ़ने लगीं, स्प्रिच्युल म्यूजिक का आनंद लेने लगीं और पार्टी-वार्टी से परहेज करने लगीं।

जाहिर है कि आज पैरेंटिंग पढ़ाई की भांति सीखने की प्रक्रिया हो चली है। देश भर की बुक शॉप्स पर 300 से ऊपर पैरेंटिंग की किताबें उपलब्ध हैं। एक किताब "मम्म गाइड" में नवजात शिशु के डाइपर बदलने से लेकर डांस क्लासों तक की जानकारियां समाई हैं। इंटरनेट के जरिए भी मार्डन पैरेंट्स खुद को अपडेट करने में जुटे हैं। दस साल पहले चालू इंडिया पैरेंट्स डॉट कॉम ने 10,000 पेज संजोए और रोजाना 30 से 50 हजार यूजर्स ने इन्हें एक्सेस किया यानी पलटा।

नए युगल पैरेंटिंग को गंभीरता से ले रहे हैं। "एगमांट इमेजिनेशन इंडिया लिमिटेड" द्वारा सन् 2001 में की स्टडी से जगजाहिर होता है कि नए पैरेंट्स ज्यादा जागरूक हैं और नन्हें-मुन्नों से जुड़ी मामूली बातों को भी पूरी तवज्जो देते हैं। असल में, पैरेंटिंग से जुड़ी किताबों का बाजार 500 करोड़ रुपए पार कर चुका है और 20 फीसदी की रफ्तार से फैल रहा है। वेल्यू सिस्टम यानी बड़े-बुजुर्गो के आदर-सत्कार का टेक्नो रुख, तेजी से बिखरते संयुक्त परिवार और उफान पर कम्पीटिशन के चलते पैरेंटिंग की भूमिका को नया आकार और रूप मिला है। ज्यादा से ज्यादा पेरेंट्स कम से कम बच्चे चाहने लगे हैं ताकि बच्चों का विकास विशेष ढंग से कर सकें। दिल्ली की गरिमा तनेजा की साढ़े तीन साल की बेटी है। जब उसकी बेटी महिका पांच साल की ही थी, तभी से उसे किताबें पढ़-पढ़ कर सुनाने लगी। महिका ने भी जानकारियों को यूं उठाया कि डेढ़ साल की होते-होते उसे सभी ग्रहों के नाम रटे थे। गरिमा कहती हैं, मेरी बेटी दूसरे बच्चों से सुपीरियर है। मैं उसे आगे बढ़ने का हर मौका देना चाहती हूं।

सन् 2002 में पार्थ फाइंडर्स द्वारा देश के 38 शहरों की दस हजार शादीशुदा औरतों पर की गई एक स्टडी से पता चला कि 35 फीसदी से ज्यादा औरतों को इसकी उम्मीद है कि उनके बच्चे दूसरों से कहीं बेहतर हैं। देश की चारों दिशाओं की 34 फीसदी से ज्यादा औरतें एक स्वर में कहती हैं, ‘बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ाना चाहिए, बेशक ज्यादा पैसा क्यों न खर्च करना पड़े। यानी अभिभावक बच्चों को हर हाल में बेहतर से बेहतर मुहैया करना चाहते हैं। बीते पांच-आठ सालों में, समाज बच्चों के इर्द-गिर्द खड़ा है। पैरेंट्स अपने-अपने बच्चों को समय, ऊर्जा और पैसा सभी जरियों से सींचना चाहते हैं।

आज के पैरेंट्स को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-एक, बड़ी कमाई और बड़ी कामयाबी हासिल करने वाले और दूसरा, जिन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ था इच्छाशक्ति ही नहीं रही। दोनों श्रेणियों के अभिभावक अपने बच्चों में महत्वाकांक्षाएं संजोते हैं। और हाइपर पैरेंट्स का रुख अख्तियार करते देर नहीं लगती। यहीं बच्चों पर दबाव बनने लगता है। समाजशास्त्रियों का मत है कि बच्चों को प्यार, दुलार और बातचीत के बदले पैसा या जरूरतों को बढ़-चढ़कर पूरा करना ही दोष पैदा करता है। समय के  बजाए बच्चों पर पैसा बहा कर, कुछ माता-पिता अपनी जिम्मेदारी निभाना समझने की भूल करने लगते हैं। मार्डन पैरेंट्स को किस सलाह पर चलना चाहिए ताकि कहीं परवरिश में चूक न हो जाए? एक्सपर्ट राय है कि खुश और कामयाब बच्चों में फर्क समझ जाए। सच है कि खुश बच्च कामयाब हो सकता है, लेकिन कामयाब खुश नहीं। तमाम एक्टिविटीज की ओर बच्चों को मोड़ना जानकारी या मनोरंजन से दूर भी करता है। क्योंकि बच्चे जिसे एंज्वाय करेंगे, उसे याद भी रखेंगे। जरूरी है कि लांग टर्म बुनियाद बनाई जाए। दिल्ली के हिंदूराव अस्पताल के बाल विशेषज्ञ डॉ. प्रणव गुप्ता आगाह करते हैं, ‘अभिभावक अपने नन्हे को रोल मॉडल बनाने के लिए ढेरों इनपुट्स की बौछार तले कतई न दबाएं। यह पैरेंट्स की स्किल्स दिखाने का शोकेस कतई नहीं है, बल्कि सेहतमंद बाल विकास का मामला है। ज्यादातर अभियान बच्चों के कुदरतन चरित्र को नजरअंदाज करने की भूल करते हैं। खासतौर से जब बच्चों को  लेकर बेहद महत्वाकांक्षी होने लगते हैं।’ दूसरे शब्दों में, अभिभावकों को अपने-अपने बेटी या बेटे की क्षमताओं को समझना जरूरी है। विज्ञान ने प्रमाणित किया है कि शुरुआती रुझन पैदा करना बेहतर दिमाग को विकसित करने में हरगिज सक्षम नहीं है। अत: पैरेंट्स को नसीहत है कि बच्चों को उनकी तय रफ्तार से ही बढ़ने की छूट दीजिए। सो, अपने-अपने बच्चों की परवरिश करने का तौर-तरीका पैरेंट्स को खुद-ब-खुद तय करना है।

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