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कोई बताए कि काफ़िला क्यों लुटा

बंगाल के राज्यपाल गोपाल गांधी मुख्यधारा के राजनेता नहीं हैं। पिछले दो-तीन साल में कई बार वे ऐसी बातें कह चुके हैं, जिन्होंने राजनीति की औपचारिक भाषा के बंधनों को तोड़ा। 14 मार्च 2007 में नन्दीग्राम की हिंसा के खिलाफ उनका वक्तव्य इसी तरह का था। वह वक्तव्य सीपीएम के खिलाफ था। राज्यपाल होने के नाते प्रदेश सरकार का विचार ही उनका दृष्टिकोण होना चाहिए। यह संवैधानिक व्यवस्था है। पर गोपाल गांधी इस व्यवस्था से परे जाकर अपनी बातें कहते रहे हैं। उनके कद को देखते हुए सरकारी मशीनरी आपत्ति व्यक्त नहीं करती। करती भी है तो औपचारिकता भर के लिए। पिछले हफ्ते गोपाल गांधी ने बंगाल में पिछले कुछ समय से चले आ रहे हिंसा के तांडव को लेकर अपनी फिक्र को एक लिखित वक्तव्य में व्यक्त किया। इसमें उन्होंने बंगाल के सभी राजनैतिक समूहों पर टिप्पणी की है। उन्होंने पूछा, जब सभी राजनैतिक पक्षों का मंतव्य एक है, तब हिंसा रुकती क्यों नहीं? जवाब भी दिया, कि जो इसे रोक सकते हैं, वे रोकते नहीं।

कौन लोग हैं, जो हिंसा करते हैं? या हिंसा को बढ़ावा देते हैं? राजनैतिक विचार के विरोध में हत्याएं बंगाल में अर्से से होती आ रही हैं। पिछले लोकसभा चुनावों के बाद से राज्य में 73 हत्याएं हो चुकीं हैं। मरने और मारने वालों में मुख्यधारा की पार्टियों के अलावा माओवादी दल भी हैं। इस खूनी राजनीति ने बंगाल में अच्छी जड़ें जमा लीं हैं। पर पिछले कुछ महींनों मे अति हो गई। गोपाल गांधी का पिछला वक्तव्य सीपीएम के खिलाफ था। इस बार का वक्तव्य सबको जिम्मेदार मानता है। जो लोग भी न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं, उन्हें अन्याय की परिभाषा भी करनी चाहिए। इस अंधे संग्राम में किसे न्याय मिलेगा?

राजनीति में सब जयाज है, ऐसा कुछ लोग मानते होंगे। पर ऐसा विश्वास के साथ कहा नहीं जा सकता। जो कहा जाता है, वैसा होने लगे तब राजनीति से किसी को शिकायत नहीं होगी। इतनी मूल्यबद्ध राजनीति की अपेक्षा किसी को नहीं, पर कोई यह भी नहीं चाहता कि राजनीति ढोंग का अखाड़ा बने। व्यावहारिक राजनीति की रेखाएं खींची जातीं हैं। कुशल राजनेता मर्यादाओं को समझता है। तभी राजनीति में रह पाता है। बंगाल में जो पार्टी सत्ता में आना चाहती है, उसे उस स्थिति की कल्पना करनी चाहिए, जब वह सत्ता में होगी। उसे उसके बाद भी चुनाव के मैदान में आना है। पिछले कुछ वर्षो से पार्टियां ऐसे व्यवहार कर रहीं हैं जैसे उन्हें दुबारा चुनाव नहीं लड़ना। या उन्हें लगता है कि वोट देने वाला नैतिकता-फैतिकता नहीं जानता। उसके पास मुजे वोट देने के अलावा चारा ही क्या है?

गोपाल गांधी के वक्तव्य से राजनैतिक दल नहीं सुधरेंगे। उन्हें सुधारने की मशीनरी जनता के पास है, जिसे फिलहाल पाच साल में एक मौका मिलता है। बंगाल की विडंबना है कि हर पार्टी अपने तईं जनता के साथ न्याय कर रही है। पर न्याय की परिभाषा हर पार्टी के पास अपनी है। नन्दीग्राम और सिंगूर ने सीपीएम के सफाए का इंतजाम कर दिया है। माकपा अपने ही हथियार की शिकार है। उसकी राजनीति आंदोलनों और कार्यकर्ताओं की संगठित और हिंसक शक्ति के सहारे चलती थी। कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था, इसलिए हिंसा मुखर और प्रखर दोनों थी। अब उस हिंसा का जवाब देने वाले पैदा हो गए हैं। दूसरी ओर माकपा को राज्य के आर्थिक विकास का सूत्र भी समझ में आया है, पर इस दौरान उसकी राजनीति के समानांतर एक और राजनीति जन्म ले चुकी है।

राजनीति दरअसल विसंगतियों के बीच जोड़ बैठाने की कला भी है। सारी दुनिया में मनुष्य के कल्याण का अर्थ मध्य और निम्न मध्य के कल्याण तक सीमित रहता है। बंगाल में ममता बनर्जी जिन सवालों को उठा रहीं हैं, वे सिद्धांतत: उचित पर अर्धसत्य हैं। संयोग है, पिछले हफ्ते अमर्त्य सेन कोलकाता में थे। बंगाल के विचारशील समाज के साथ संवाद के अलावा नन्दन में ‘न्याय और भारत‘ विषयक उनकी वक्तृता महत्वपूर्ण थी। उन्होंने कहा कि बंगाल में टाटा की फैक्ट्री लगती तो बंगाल के औद्योगिक पुनरुद्धार का रास्ता भी खुलता। साथ ही उन्होंने कहा कि कारखाने लगाने के लिए जमीन का अधिग्रहण आखिरी विकल्प होना चाहिए। आर्थिक विकास चाहिए, मानवीय मुखौटे के साथ। इन दिनों पुनर्वास और पुनर्स्थापना कानून और भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून की चर्चा भी है। इन दोनों कानूनों में बहुत सी बातें छिपीं हैं, जो बंगाल की चालू राजनीति से जुड़ीं हैं। प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण संशोधन में अधिग्रहण के ‘सार्वजनिक उद्देश्य‘ को परिभाषित करने की कोशिश की गई है, पर उस मामले में अभी और सफाई की जरूरत है। इसी तरह पुनर्वास बिल में ‘मिनिमम डिस्प्लेसमेंट‘ और ‘सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट‘ के अलावा पुनर्वास पहले हो या जमीन पहले ली जाय जैसे मसलों पर सवाल हैं। विकास का रास्ता गरीबों की तबाही की बुनियाद पर नहीं बनेगा। अमर्त्य सेन का कहना है कि सामाजिक न्याय के लिए एक पूर्ण न्याय समाज के बनने का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए। इसके लिए जरूरी है नीति की संस्थाएं (प्रशासन और राजनीति) न्याय-कामनाओं को समझें। यह न्याय, मत्स्यन्याय नहीं, जिसमें बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाय। भारत में बाल कुपोषण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, लैंगिक असमानता जैसे तमाम मसले मुख्यधारा के राजनैतिक विमर्श के बाहर हैं। अमर्त्य सेन के अनुसारसमस्या का समाधान है, सार्वजनिक विमर्श में जनता की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी।

राजनीति इस देश के वंचितों और फटेहालों का संबल है। उसमें जनता की भागीदारी बढ़ाना कोई अटपटी मनोकामना नहीं। पर सच यह है कि राजनीति कुछ थोड़े से लोगों के हाथों में कैद है। राजनेताओं की एक जमात जनता को नासमझ मानकर चलती है। और शायद उसे सबल औरजागरुक बनाने की इच्छा भी नहीं रखती। चूंकि जनता के बगैर भी राजनीति सम्भव नहीं, इसलिए राजनेता को पाखंड रचने होते हैं। इस राजनीति में बैठे अनेक राजनेता इसे समझते हैं, और वे न्याय-भावना को लेकर ही इसमें शामिल हुए हैं। वे ही इसके रास्ते निकालेंगे। हमें और आपको इसके लिए उन्हें निरंतर प्रेरित करना होगा। गरीबों और फटेहालों की दशा में सुधार से उच्च और मध्य वर्ग का जीवन भी बेहतर होता है, बल्कि तभी होता है। सीने में जलन के साथ जीने वाला समाज खुशहाल नहीं हो सकता। उसमें नीति, न्याय और राजनीति सब अस्वस्थ होते हैं। हमें राजनैतिक दर्शन से ज्यादा राजनैतिक आचरण की जरूरत है। गोपाल गांधी का मंतव्य है, जो कुछ कर सकते हैं, वे कुछ करते नहीं। और उन्हें ही कुछ करना होगा।

pjoshi@hindustantimes.com
लेखक ‘हिन्दुस्तान’ में दिल्ली संस्करण के वरिष्ठ स्थानीय संपादक हैं

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