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22 फरवरी, 2020|10:13|IST

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उर्दू मीडियाः फैसले पर गुस्सा

‘इस मुल्क में क्या इंसाफ के दो पैमाने हैं?’ यह शीर्षक है ‘सहाफी’ में छपे ए.बी. मसूद के एक लेख का। उर्दू अखबार स्पेशनल कोर्ट के मालेगांव धमाके के सभी नौ आरोपियों को महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनॉइज्ड क्राइम एक्ट से बरी किए जाने पर बिफरे हुए हैं। गोधरा कांड
में 96 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने और मालेगांव धमाके के आरोपियों को मकोका से बरी किए जाने को इंसाफ के दोहरे मापदंड का पैमाना माना है। ‘जदीद खबर’ कहता है, दहशतगर्दी रोकने के नाम पर नित नए बनने वाले कानून का मुसलमान इसीलिए विरोध करते हैं। कानून बनाने वालों को पता है कि इससे कब और किसका शिकार करना है। मालेगांव मामले में उर्दू मीडिया के भड़कने से महाराष्ट्र सरकार और कांग्रेस चिंतित है। महाराष्ट्र सहित कई सूबों में जल्द विधानसभा चुनाव होने हैं। कड़वाहट और भ्रम के चलते मुसलमान उससे फिर बिदक सकते हैं। इससे उबरने के लिए महाराष्ट्र के गृहमंत्री मोहम्मद आरिफ नसीम खान और कांग्रेस के अल्पसंख्यक सेल के चेयरमैन फैयाज खान अखबारों के दफ्तरों में सफाई देते घूम रहे हैं। इस फैसले पर महाराष्ट्र सरकार कह चुकी है कि ठोस सबूतों के साथ इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जएगी। फिर भी उर्दू अखबार नरम नहीं पड़ रहे। कोर्ट पर सीधी टिप्पणी करने से तो बचा जा रहा, पर सरकार और ए.टी.एस. को घेरने की हर मुमकिन कोशिश जरी रही है। अखबार लिखते हैं, ‘कोर्ट का फैसला तस्लीम! पर इससे पैदाशुदा सूरत-ए-हाल में संगठित अपराध को परिभाषित करना जरूरी हो गया है।’

‘सियासत’ में अमरेश मिश्र कहते हैं कि बम धमाकों के आरोपी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित, स्वामी दयानंद पांडेय, सुधाकर चतुर्वेदी,रमेश उपाध्याय और इनके संगठन अभिनव भारत का इजराइल से गहरा नाता है। उसकी मदद से 2024 तक भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने और देश के खास हिस्से में धमाके करने की योजना बनाई गई थी। इसी क्रम में मालेगांव में तीन साल पहले धमाके कराए गए थे। जिसमें सात लोगों की मौत हुई थी और दजर्नों घायल हुए थे। पुरोहित ने सेना में रहते आरडीएक्स इकट्ठे किए। आरोपियों पर देशद्रोह का मुकदमा नहीं चलाना भी हैरत की बात है। ऐसे मामले में यह एक्ट जरूर लगता है।

‘सहाफी’ लिखता है, तत्कालीन एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे के धमाके के आरोपियों के खिलाफ तैयार चाजर्शीट के पेज 67 में मकोका लगाने केपर्याप्त सबूत होने का जिक्र था। अब स्पेशल कोर्ट कह रही है कि धमाकों के आरोपियों के खिलाफ संगठित अपराध के माकूल सबूत नहीं हैं। साक्ष्य जुटाने में कहीं जान-बूझकर कोताही तो नहीं बरती गई? फैसला आने से सप्ताहभर पहले फार्स्ट ट्रैक कोर्ट महाराष्ट्र के पूरना की मस्जिद मेराज उलूम में 27 अगस्त 04 में धमाका करने के आरोपी राकेश धावड़े को भी सबूतों के अभाव में बरी कर चुकी है। उस पर एक अन्य मस्जिद में धमाके करने के आरोप में मुकदमा चल रहा है। इसमें भी एटीएस पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाई। 26/11 के हमले में करकरे के शहीद होने पर के पी रघुवंशी एटीएस प्रमुख बनाए गए। तभी से मुसलमानों इसका विरोध कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले रघुवंशी मालेगांव धमाकों की जांच करकरे से पहले कर चुके हैं। तब उन्होंने जांच में अहम सबूत न मिलने की बात कही थी। एटीएस पर कोर्ट में ठीक से पैरवी

नहीं करने का इल्जाम लग रहा है। स्पेशल कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने के प्रदेश सरकार के फैसले से बीजेपी और शिवसेना उखड़ी हुई है। इनके नेताओं को विश्वास है कि हाईकोर्ट में भी सभी आरोपी बाइज्जत बरी हो जाएंगे। फिर देश को बताया जाएगा, आतंकवाद के नाम पर कांग्रेस कैसा खेल खेल रही है। मुसलमानों ने 6 अगस्त को शब-ए-बारात के त्योहार पर धमाके के तीन साल पूरे होने पर सामूहिक नाराजगी जताई। मालेगांव वालों का आगरा-मुंबई हाइवे जाम करने का इरादा था। विरोधी पार्टियों के कड़े तेवर के चलते किसी अनहोनी से बचने को उन्होंने इसे मुल्तवी कर दिया।

मालेगांव धमाके को लेकर उर्दू मीडिया में मचे बवाल के बीच सिनेस्टार इमरान हाशमी के मुस्लिम होने के नाते मकान नहीं दिए जाने की खबर दब गई। एक-दो दिन के बाद यह नजर ही नहीं आई। बीबीसी उर्दू पोर्टल में इमरान के बहाने शबाना आजमी, जीनत अमान, जुल्फी सैयद, सोफिया मर्चेंट, सैफ अली खान के बतौर मुसलमान मकान मिलने में आई परेशानी का जरूर जिक्र किया गया। अखबारों में सलमान और शाहरुख के उस बयान को तरजीह मिली, जिसमें कहा गया कि मजहबी भेदभाव होते तो आज वे जो हैं, नहीं होते।

लेखक ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े हैं
malik_hashmi64@yahoo.com

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