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संत महीपति

संत महीपति परम भागवत संत थे। उन्होंने पंढरीनाथ विट्ठल की कृपा से भक्तों के चरित्र लिखे। उन्होंने मराठी-साहित्य में जो भी वृद्धि की वह मौलिक और परम महत्वपूर्ण है।
संत महीपति का जन्म सन 1715 के लगभग महाराष्ट्र के ताहराबाद में हुआ था। उनके माता-पिता ग्वेदीय वसिष्ठ गोत्रीय ब्राह्मण थे। वे पंढरीनाथ विट्ठल के भक्त थे और उनके दर्शनों के लिए पंढरपुर नियमित जाया करते थे। बालक महीपति भी उनके साथ जाते और उनमें इस प्रकार भगवत भक्ति बढ़ती गई। महीपति को अच्छी शिक्षा दी गई। उन्हें कई भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। कहते हैं उनको स्वप्न में संत तुकाराम ने दीक्षा देकर कहा था- ‘मैंने अपने जीवनकाल में नामदेव के अभंगों की रचना का शेष कार्य पूरा किया, आप संतों और भक्तों के चरित्र का वर्णन कीजिए।’ संत तुकाराम के आशीर्वाद से महीपति में काव्य-चेतना जाग्रत हुई। उन्होंने गुरु संत तुकाराम की वंदना में कहा- ‘नमूं सद्गुरु तुकाराम, जेणो रिसिल भवभ्रम। आपुले नामी देऊनि प्रेम, भवबंधन निसिले।।’

कहते हैं कि भक्त-चरित्रों के लेखन का अवसर, अनेक पुण्यों के फल के रूप में मिलता है। संत महीपति ने भक्तों के चरित्र की महिमा का गान करके, भगवान की सेवा की। वह कहते थे कि भक्ति ही भगवान का स्वरूप है। उन्होंने भगवान की भक्ति के लिए कहा- ‘जो परम उदार हैं, जिनके गुणों का वर्णन शेष करते हैं, जिनका सदाशिव ध्यान करते हैं, वे जगजीवन हैं। जो ब्रह्म के पिता हैं, चराचर की सृष्टि करने वाले हैं, माया पर नियंत्रण करने वाले हैं, वे ही पांडुरंग हैं, जो काल के शासक हैं, भव के श्रम को हरने वाले हैं, अपने भक्तों के प्रति गौरव बुद्धि वाले हैं, स्वाभिमानी हैं, वे ही जगदात्मा पाण्डुरंग हैं। पुराण जिनका वर्णन करते हैं, वेद जिनके संबंध में मौन धारण कर लेते हैं, जिनका सनक आदि ध्यान करते हैं, वे ही जगजीवन श्रीहरि हैं, जो भक्तों के कार्य करने वाले हैं, जिन्होंने पाण्डवों की सहायता की, जो विश्वलीला सूत्र को धारण करने वाले हैं, वे ही पंढरपुर में खड़े हैं।’

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  • Web Title:संत महीपति