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अच्छी चली संसद

बजट सत्र में संसद का काम-काज देख कर कहा जा सकता है कि हमारे जनप्रतिनिधि जनता की आकांक्षाओं पर खरे उतर रहे हैं। पिछली संसद में विपक्षियों और सहयोगी दलों की खींचतान से आजिज लोगों ने ऐसी लोकसभा बनानी चाही थी, जहां  हंगामों के बावजूद लोकतांत्रिक काम-काज सुचारू गति से चलता रहे और वह लक्ष्य पंद्रहवीं लोकसभा के इस बजट सत्र में संभव हो गया। इसका श्रेय सौ दिन के लक्ष्य पर ध्यान लगाए सरकार, देश की पहली महिला स्पीकर की कार्यकुशलता और हार के बाद आपसी झगड़ों से पस्त पड़े विपक्ष को दिया जा सकता है। अगर हम इस सत्र की तुलना पांच साल पहले हुए इसी सरकार के बजट सत्र से करें तो स्थिति बेहतर नजर आती है। सन् 2004 के इस सत्र में लोकसभा 24 दिनों में सिर्फ 92 घंटे काम कर पाई और उसके 47 घंटे हंगामे और स्थगन में निकल गए। उसकी तुलना में 2009 में सदन ने 26 दिनों में 162 घंटे काम किया और इसमें 31 अतिरिक्त घंटे जोड़े गए। हालांकि इस सत्र में भी लोकसभा का साढ़े 23 घंटे हंगामे में निकला, फिर भी वह पांच साल पहले के सत्र के मुकाबले डेढ़ गुना ज्यादा काम करने का दावा कर सकती है।

लेकिन संसद की यह उपलब्धि सिर्फ घंटों के संदर्भ में नहीं है, वह ठोस काम के स्तर पर भी है। इसमें ठीक-ठाक चर्चा के बाद आम और रेलवे बजट का पास होना तो है ही, साथ में 62 सालों से प्रतीक्षित मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का ऐतिहासिक विधेयक भी है। निश्चित तौर पर शिक्षा के अधिकार का विधेयक मानव संसाधन के विकास और देश की तरक्की में बहुत बड़ा उपकरण बनने जा रहा है। इस कामयाबी के बावजूद अगर सरकार जजों की परिसंपत्तियों और भूमि अधिग्रहण का विधेयक नहीं पास करवा सकी तो इसके पीछे उसकी लोकतांत्रिक झिझक साफ देखी जासकती है। इन बिलों को रोकने का श्रेय सिर्फ विपक्ष नहीं ले सकता क्योंकि इन पर सरकार के सहयोगी दलों से और पार्टी के भीतर भी असहमति थी। फिर इन दोनों बिलों को जल्दी में पास करवाने के बजाय इन पर व्यापक बहस चलाने, राय बनने और उसे पकने का मौका दिया जाना चाहिए। रबड़ विधेयक को अगर वाणिज्य मंत्री और राज्य मंत्री की अनुपस्थिति के कारण रोकना पड़ा तो यहां जरूर चूक हुई है। फिर भी युवा सांसदों की सक्रियता और विपक्ष के आलोचनात्मक सहयोग से संसदीय काम का जो माहौल बना है वह स्वागत योग्य है।

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  • Web Title:अच्छी चली संसद