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सेहत और सरकार

यह ठीक है कि घबराने से कुछ हासिल होने वाला नहीं है। देश में स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ रहे हैं और इसकी वजह से एक दुखद मौत की खबर भी हमारे पास है। लेकिन अभी भी स्वाइन फ्लू ऐसा रोग है, जिसका इलाज उपलब्ध है। खुद भारत सरकार ने इसके इलाज की एक करोड़ खुराक सुरक्षित रख ली हैं। इस रोग की वजह से होने वाली मृत्यु दर एक फीसदी से भी कम है, इस लिहाज से यह व्यापक तौर पर फैलने वाला रोग भले ही हो पर महामारी नहीं है। मामला किसी भी तरह से आतंकित होने का नहीं है, लेकिन स्वाइन फ्लू जैसा रोग जब फैलता है तो कई चिंताएं जरूर सामने आती हैं। मसलन, दुनिया भर में डेंगू को जानलेवा बीमारी नहीं माना जाता। लेकिन हमारे यहां इस रोग से हर साल कई जानें जाती हैं। एक तो बहुत से मरीजों की स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच नहीं है और जिनकी पहुंच है भी, उन्हें समय रहते ब्लड प्लेटलेट्स उपलब्ध नहीं हो पाते।

स्वास्थ्य सेवा का सर्वसुलभ और भरोसेमंद न होना एक ऐसा मसला है, जो हमें स्वाइन फ्लू के बिना भी डराता है। जिस देश में डायरिया, तपेदिक और मलेरिया से हर साल कई मौतें होती हों, वहां आम आदमी यह कैसे स्वीकार कर ले कि सरकार फटाफट किसी नए रोग से सबको सुरक्षा दे देगी। संक्रामक महामारियों से लड़ने के लिए हथियार के बतौर सरकार के पास 1897 में बना एक कानून है और एक ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था, जो इससे भी ज्यादा जजर्र हो चुकी है। पिछले कई साल में हमने शहरी सार्वजनिक स्वास्थ्य का विशाल क्षेत्र धीरे-धीरे निजी क्षेत्र के हवाले कर दिया है। ग्रामीण क्षेत्र में तो पहले भी नीम-हकीम अभाव की भरपाई करते थे, अब भी करते हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र भी शुरू से वैसीही नौकरशाही, अकर्मण्यता, और साधनहीन खस्ताहाली का शिकार रहे हैं, जिसके शिकार शहरों के सरकारी अस्पताल अब हो चुके हैं। स्वाइन फ्लू से लड़ने का काम इसी जंग खाई व्यवस्था के हवाले कर दिया गया है। कुछ सरकार की अदूरदर्शिता और कुछ उसके अपने स्वार्थो के चलते निजी क्षेत्र में ऐसे संक्रामक रोगों से लड़ने का तंत्र विकसित नहीं किया जा सका है। एक सार्वजनिक व्यवस्था ही यह काम कर सकती है। इसलिए फिलहाल स्वाइन फ्लू के मरीजों का इलाज करने के साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का दीर्घकालिक इलाज भी जरूरी है।

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