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आम आदमी के साथ है हाथ तो पहले पुलिस को सुधारे

पश्चिमी उत्तर प्रदेश (उत्तर प्रदेश के मानदंडों पर भी) अपराध बहुल क्षेत्र है, यह बात सभी स्वीकार करते हैं। पर अभी हाल में मेरठ जोन के कमिश्नर ने गाजियाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को लिखे अपने पत्र में लिखा है कि जनता से इलाके की पुलिस की उदासीनता की कई शिकायतें मिलने पर उन्होंने 28 जुलाई को अपने कार्यालय को निर्देश दिया था कि गाजियाबाद जिले के तीनों महत्वपूर्ण थानों (इन्दिरापुरम, लोनी और साहिबाबाद) को फोन करके पता किया जाए, कि वहाँ तैनात पुलिस कितनी सतर्क सजग है। तीनों थानों से सम्पर्क करने पर किसी भी थानाध्यक्ष ने अपनी कॉल अटैण्ड नहीं की। न ही वे फोन के पास मौजूद पाए गए। कमिश्नर के इस पत्र की प्रतियाँ मेरठ जोन के आई.जी. तथा गाजियाबाद के जिलाधीश को भी भेजी गईं। पहले गौतमबुद्ध नगर के जिलाधीश रह चुके कमिश्नर महोदय श्रवण कुमार शर्मा ने यह भी लिखा कि जब अतिरिक्त आयुक्त ने खुद फोन किया तो वह भी नहीं रिसीव किया गया। थानाध्यक्ष का मोबाइल फोन तक साहिबाबाद थाने में अटैण्ड नहीं किया गया। लैण्डलाइन भी एक जगह (लोनी) आउट ऑफ सर्विस पाई गई।

पुलिस थानों की दुर्दशा और मानवाधिकार संगठनों की रपटों में उल्लिखित पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों ने हमें चौंकाना बंद कर दिया है। पिछले 30 सालों से नाना समितियों की रपटों ने यह बहुत सुथराई से सामने ला रखा है, कि भारतीय पुलिस सेवाओं में कहाँ किस तरह के सुधारों की जरूरत है और उन्हें किस तरह जल्द से जल्द अंजाम दिया जा सकता है। देश के गृहमंत्री ने यह भी बताया है कि कानून और व्यवस्था की शिथिलता के चलते देश के 160 जिले नक्सली हिंसा की गिरफ्त में पड़े हुए हैं। लेकिन हाल में जब राजधानी के कुछ महत्वपूर्ण राजनेताओं की निजी सुरक्षा को तैनात पुलिस की तादाद घटाने का (नितांत तर्कसंगत) सुझाव दिया गया, तो पूरा विपक्ष सरकार पर पिल पड़ा। यहाँ तक कह दिया गया कि सुरक्षातंत्र की कमजोरी से इनमें से किसी भी रणबाँकुरे का बाल भी बाँका हुआ तो गृहमंत्री जी जेल की हवा खाने को तैयार रहें। ज्ञातव्य यह भी है कि देश के इन 13 हजार महारथियों की सुरक्षा में तैनात 45 हजार सुरक्षाकर्मियों पर 2008 में 600 करोड़ का खर्चा आया। राजधानी दिल्ली में तो 25 प्रतिशत पुलिस बल इसी ड्यूटी पर लगा हुआ है।

आम आदमी से पूछा जाय तो वह देशभर में नक्सली और माओवादी हिंसा और संगठित अपराधी गुटों के बढ़ते वर्चस्व को देखकर कहेगा कि सर्वशिक्षाधिकार, सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश या खाद्यान्न पाने के अधिकार वगैरह की तुलना में कानून-व्यवस्था की धुरी- पुलिस में सुधार देश की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। 1861 के कानूनों पर चलाई जा रही पुलिस के सुधार के लिए 2006 से जो मॉडल पुलिस बिल तलघर में पड़ा हुआ है, उसे पारित कराने में आखिर क्या ऐसी विराट अड़चन है?

पुलिस सुधारों की भरोसेमंद शुरुआत देश में तभी शुरू हो पाएगी, जब सबसे पहले पुलिस महकमे और कानून की अनुपालना को नेताओं तथा कार्यपालिका की उस समवेत जकड़बंदी से छुटकारा दिलाया जाए, जिसने पुलिस को व्यवस्था का पालतू शेर बना डाला है। मध्यप्रदेश में एक जनहित याचिका से प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2008 में राजनेताओं के इशारों पर वहाँ 600 पुलिस तबादले किए गए। लेकिन जनता तथा सुधार समितियों की रपटें चाहे जो भी तजवीज करें, अपनी ताकत बढ़ाने को पुलिस का इस्तेमाल करते रहें, राजनेता आसानी से अपने नियंत्रण से उसे बाहर करने से रहे। ‘साथिया’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘मकबूल’ जैसी फिल्मों में पुलिस-नेता और अपराधियों की जिस मिलीभगत और फर्जी एनकाउंटर प्रक्रिया के निकट दर्शन कराए गए हैं, वह महज खामखयाली नहीं, एक दारुण सच्चई है। और अब तो सीबीआई तक कह रही है कि देहरादून में रणवीर प्रथम दृष्टतया एक फर्जी एनकाउंटर में मारा गया लगता है। यूँ पुलिस सुधारों के लिए केरल, मध्यप्रदेश, राजस्थान, त्रिपुरा, मेघालय, अरुणाचल, हिमाचल, कर्नाटक जैसे कुछेक राज्यों ने अपनी नई पहल शुरू कर दी है। (एम.आई.टी. की) ताज सर्वेक्षण रपट के अनुसार राजस्थान के थानों में इससे प्रशंसनीय सुधार दिखाई भी देने लगे। लेकिन यह भी गौरतलब है कि दिल्ली और उन केन्द्रशासित प्रदेशों में अभी कोई नई पहल नहीं दिखाई दे रही, जहाँ विशिष्ट व्यक्तियों की तादाद सबसे बड़ी और पुलिस पर उनकी जकड़बंदी सबसे सख्त है।

बात सिर्फ राजनैतिक जकड़बंदी तक ही सीमित नहीं। पुलिस थानों में जो बर्ताव सामान्य नागरिकों के साथ होता है, वह भारतीय राज और समाज दोनों की संरचना की कुछ खामियों को दिखाता है। यह ठीक है कि पुलिस बल दुनिया में कहीं भी बुद्ध-महावीर की करुणा और ममत्व के नियमों पर नहीं चलते, लेकिन जनता के हकों के प्रति हिकारत और शिकंजे में आए हर व्यक्ति का अपमान करने की पाशवी इच्छा हमारे थानों का नितांत देसी गुण है। कुछ मायनों में (तनिक कम विशेषज्ञता के साथ) ऐसी ही दमनकारिता कई भारतीय परिवार अपनी बहुओं-बेटियों के प्रति भी दिखाते हैं। हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने भी हाल में कह दिया है, कि सासें यदि बहुओं को लात मारें, उनके मायके वालों को कोसें और बेटों को उनके खिलाफ उकसायें तो यह सब दहेज-उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं, सामान्य अपराध की श्रेणी में ही आता है। सास बनते ही एक ममतालु माँ का चरित्रान्तर सामाजिक तौर से स्वीकृत हो जाता है, वैसे ही हमारे यहाँ खाकी वर्दी पहनते ही एक धर्मभीरु, मर्यादाप्रेमी नागरिक का भी हिंसक कठोर आततायी बनना भी। अगर सांप्रदायिक या जतीय दंगों के वक्त कोई वर्दीधारी नरमी से बर्ताव करता दिखाई दे तो कईयों को शक होने लगता है कि वह जरूर बगावती तत्वों से भीतरखाने मिला हुआ है। यहाँ हम सब कहीं पुलिसिया संस्कृति के अंग बन जाते हैं। घर की महिलाओं से, अल्पसंख्यकों से, नापसन्द पड़ोसियों से अपने बर्ताव में भारत का औसत नागरिक भी प्राय: पुलिसिया किस्म का आचरण करता है। और यही वजह है कि हमारे यहाँ स्कूल कॉलेज जाती लड़कियाँ, घर के आगे खेलती बच्चियाँ, पार्क में बैठे युवा प्रेमी, रात की पाली में काम करने वाली नर्से, और काम से देर रात घर लौट रही महिलाएँ कोई भी पुलिस या मौका पाते ही वहशी बन जाने वाले नागरिकों से सुरक्षित नहीं।

कानून और व्यवस्था राज्यों के विषय हैं। अत: अगर अपने दूसरे कार्यकाल में संप्रग सरकार पुलिस में सुधार लाने की इच्छुक है, तो उसे पहले तो दिल्ली समेत सभी राज्य सरकारों पर ईमानदार दबाव बनाना होगा, कि सुधारों की दिशा में पुलिस आयोग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार तय ठोस कदम उठाएं। साथ ही उसे अपने क्षुद्र दलगत हितों से ऊपर उठकर उन विपक्ष शासित राज्यों की तारीफ करनी होगी, उन्हें प्रोत्साहन देना होगा, जिन्होंने आदर्श कदम उठाए हैं।  2006 में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधारों को लेकर सात निर्देशक सूत्र थमाए थे। उन्हें अब जनहित में ठण्डे बस्ते से बाहर लाना जरूरी है। वी.आई.पी. लोगों को तो उस व्यवस्था को बदलने की जल्दी कतई नहीं होगी जो उनके हित में काम कर रही है; लेकिन उस आम आदमी को जरूर है, जिसे पग-पग पर पुलिस की भ्रष्टाचारी और दमनकारी ताकतों के आगे झुकना पड़ता है। जनहित को लेकर संप्रग कितनी गंभीर है, यह बात पुलिस सुधारों के संदर्भ उसकी घोषित सदयता और संवेदनशीलता की सबसे बड़ी और प्रामाणिक कसौटी होगी। परिवारों के भीतर समाज-सुधारों का सिलसिला भी तभी शुरू हो सकेगा, जब पुलिस अल्पसंख्यकों, स्त्रियों और कमजोर वर्गो को भक्षक नहीं ऐसी रक्षक नजर आने लगेगी, जिसके पास जकर वे अपनी बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने की माँग कर सकें।

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