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हंसना मना है

स्वाइन फ्लू के इन दिनों में एक दिन अचानक हिंदी के कुछ लोगों को गंभीरता का दौरा पड़ा और सदा की भांति वे एक गंभीर बयान देने को उन्मुख हो उठे। विदूषक के बारे में उनकी घृणा का तमाशा देख विदूषक वृत्ति के समाजशास्त्र और इतिहास पर नजर गई तो लगा कि गंभीरता के बीमारों को हास्य और विदूषकत्व के बारे में कोई खास जानकारी नहीं है। एतदर्थ सविनय निवेदन करने का मन हुआ। एक दिन अकबर बादशाह ने हुकुम फरमाया कि हंसना मना है। बीरबल इस पर हंसने लगा। अकबर बादशाह पूछने लगे कि जब मना किया गया है तो तुम क्यों हंसते हो? बीरबल बोला कि हजूर इसीलिए हंस रहा हूं कि आपकी बात ही कुछ ऐसी है। क्या बात है? जल्द बताओ। अकबर ने कहा। बीरबल बोला हजूर जान बख्शें तो कहने की गुस्ताखी करूं। अकबर की हां देख बीरबल ने उधर इशारा किया जिधर उनकी रानियां बैठी हुईं थीं, जब बादशाह ने देखा तो पाया कि वहां एक छिपी हंसी बिखरी थी। इसे देख बीरबल हंसता रहा.. हंसता रहा.. हंसता रहा.. हंसी को सुन कर सब सभासद पहले कुछ देर तक डरे रहे फिर हंसने लगे और हंसते रहे, आखिरकार बादशाह भी हंस पड़े। बादशाह का हुकुम भी अपने ऊपर हंसने लगा।

यह अकबर बीरबल विनोद छाप एक किस्सा है। यह ‘जन-हंसी’ है जनता के अनिवार्य हास्य का हिस्सा हैं। जिस समाज का बादशाह अकबर, बीरबल जैसे दरबारी को उसके वाक्चातुर्य और परिहासवृत्ति के लिए मान देता हो उस समाज के सांस्कृतिक जनतंत्र को आप कम करके नहीं आंक सकते। दक्षिण में कृष्णदेव राय के समय में तेनालीराम हुए। गजब की होशियारी, वाक़्चातुर्य था, हाजिर जवाबी थी और विनोद-विनोद में हर समस्या का हल बताते थे। हर भाषा में हर सांस्कृतिक समूह के अपने अपने बीरबल अपने अपने तेनालीराम होते हैं। शेख चिल्ली, गोनू झा, गोपाल भांड, लाल बुझक्कड़ आदि ऐसे ही विनोदी वृत्ति वाले किस्सागो व्यावहारिक नसीहत देकर मनोरंजन करते नजर आते हैं। यह एक संपन्न वाचिक सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें एक से एक विदूषक जोकर, क्लाउन/भांड/आदि सक्रिय रहते हैं। उनके किस्से उनकी हरकतें सुनी सुनाई जाती रहती हैं। यह चौपालों पर निजी गोष्ठियों में बनते रहते हैं। इनमें बुहत कुछ जुड़ता घटता रहता है। व्यापक समाज अपने आप इन्हें पैदा करता और संरक्षित करता रहता है। सेंट्रल एशिया के निजंधरी मजाहिया जनशिक्षक बने मुल्ला नसरुद्दीन का क्या कहना, जो अपने गधे के साथ घूमते हुए बात बात में व्यावहारिक मजाक करते रहते और सबक सिखाते रहते। बुल्गारिया साहित्य के विद्वान प्रोफेसर एस. के. विज ने बुल्गारिया में एक हुए, एक जन चरित्र चतुर पीतर के किस्सों का अध्ययन किया तो पाया कि ऐसे चरित्र असल में ‘सबवर्सिव’ होते हैं और कुछ खास सामाजिक स्थितियों में बना करते हैं। वे अपनी बात इस तरह कहते हैं कि ताकतवर का तमाचा भी लग जाए, लेकिन वह भी उस चतुराई का लोहा मान जाए और कुछ कर न सके। ऐसे चरित्र प्राय: कमजोरों की वाणी होते हैं। इसी तरह यूरोपीय साहित्य में ‘फूल’ ‘ईडियट’ क्लाउन आदि के चरित्र बात-बात में कुछ का कुछ अर्थ देने वाली हास्य-व्यंग्य, वक्रोक्ति कर अपने कीमत पर दूसरों को हंसा कर राहत की जगह पैदा करते हैं। संस्कृत नाटकों में इस तरह के विदूषक मौजूद हैं।

संरचनावादी विद्वान मिखाइल बाख्तिन का वह ऐतिहासिक अध्ययन पठनीय है, जिसमें उन्होंने ‘कार्नीवाल’ का सांस्कृतिक अध्ययन किया और बताया कि विदूषक या क्लाउन या जोकरों द्वारा कार्नीवाल में खेली जाती भडेंती, चुटकुले, व्यंग्यात्मक कमेंट आदि जिस जन-हास्य की सृष्टि करते हैं, वह ‘सबवर्सिव’ होता है। उसे सत्ता से, व्यवस्था से, तंत्र से इजाजत नहीं मिलती, लेकिन वह हंसी-हंसी में अपनी जगह बनाता रहता है। जन-हास्य किसी सत्ता की आज्ञा का या मान्यता का मोहताज नहीं होता। कार्नीवाल नुमाइशें प्रदर्शनियां मेले जनक्षेत्र/पब्लिक-स्पेस/होते हैं। कार्नीवाल में लाफ्टर या हंसी एक बड़ी सार्वजनिक क्रिया होती है, जो जिंदगी और कला के बीच की दीवार को गिरा देती है। तानाशाह वृत्ति के लोग प्राय: हास्य को पसंद नहीं करते। हिटलर के समय में बतरेल्त ब्रेख्त का हास्य व्यंग्य फासिज्म के खिलाफ एक बड़ी सबवर्सिव कार्रवाई थी। इन दिनों पाकिस्तान के जरदारी साहब ने एसएमएस पर, इंटरनेट पर अपने बारे में बनते मजाकों चुटकुलों को अपना निशाना बनाया है।

इस नाटकीय गंभीरता में एक तानाशाह मंशा सक्रिय लगती है जो अपनी सांस्कृतिक रुचि को सबकी रुचि बनाने पर तुली है, जो हास्य से इस कदर परहेज करती है कि हंसी आती है! हास्य अपनी जन-हंसी में गंभीर हो सकता है और गंभीर जी हास्यास्पद हो सकते हैं।

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