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कलाम की सीख

पूर्व राष्ट्रपति और प्रख्यात वैज्ञानिक ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को हाल के उनके लखनऊ दौरे में हमने ‘हिन्दुस्तान’ के दफ्तर आमंत्रित किया तो बच्चों को ही उनके सामने बैठाया था, यही सोचकर कि वे बच्चों से बात करना ज्यादा पसन्द करते हैं। बच्चे भी सवाल तैयार किए बैठे थे लेकिन उस दिन वे पत्रकारों से बात करने को ज्यादा उत्सुक थे और अच्छा ‘होम वर्क’ करके आए थे। उन्होंने हम अखबार वालों की बाकायदा ‘क्लास’ ली। सवाल-जवाब सत्र में भी उन्होंने पत्रकारों को ही प्राथमिकता दी।

उनसे पूछा गया- मीडिया, खासकर अखबारों की आज की भूमिका से क्या आप संतुष्ट हैं? डॉ. कलाम ने ‘हाँ’ ‘न’ में जवाब न देकर पूरी व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि मीडिया को राष्ट्रीय विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। लखनऊ में थे, इसलिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण लिया। कहा कि यहाँ 80 संसदीय क्षेत्र हैं। हाल में आपने 80 सांसद चुने हैं। संपादकों को चाहिए कि वे संवाददाताओं को क्षेत्रों में भेजकर शोध कराएँ और डाटाबेस तैयार करें। मसलन साक्षरता दर  क्या है, प्रति व्यक्ति आय, शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर कितनी है। पीने के पानी का क्या हाल है, स्कूल-अस्पताल वगैरह, सबका डाटाबेस बनाएँ। इन सब पर रिपोर्ट छाप-छाप कर अपने सांसदों पर दबाव बनाएँ कि अगले पाँच साल में उन्हें अपने क्षेत्र को इन पैमानों पर बेहतर बनाना है।

अपने विशिष्ट इंटरेक्टिव अंदाज में डॉ. कलाम ने कहा कि उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है, पिछड़ा है और इसके विकास के बिना देश का विकास नहीं हो सकता। मीडिया को अपनी शोधपरक रिपोर्टों से विधायकों, सांसदों और सरकार पर सकारात्मक दबाव बनाकर विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी ही चाहिए। उन्होंने पत्रकारों को शपथ भी दिलाई-  ‘मैं अपने प्रोफेशन से प्यार करता हूँ, मैं राष्ट्र के विकास में भागीदार बनूंगा, मैं रिसर्च को बढ़ावा दूंगा, मैं सकारात्मक खबरें    लिखूंगा और अपने लोगों, विशेषकर ग्रामीण आबादी की उन्नति को ध्यान में रखूंगा।

डॉ. कलाम जो कह रहे थे, वह अमीर-गरीब के बीच बड़ी भारी खाई वाले हमारे देश की पत्रकारिता की मूल चिंता में शामिल होना चाहिए। लेकिन क्या वह है और कितना है?

पिछले बीस वर्षो में पत्रकारिता में जबर्दस्त बदलाव आए हैं। प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी, आईटी क्रांति और टीवी अर्थात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार ने ‘मीडिया’ बन गई पत्रकारिता को एक तरफ बड़ा व्यवसाय और दूसरी तरफ अत्यन्त लोकप्रिय माध्यम बना दिया है। हिन्दी, बल्कि कहना चाहिए कि भाषायी मीडिया ने अंग्रेजी मीडिया को बहुत पीछे छोड़ दिया है। 1985 में राजेन्द्र माथुर ने एक लेख में सपना देखा था- ‘क्या वह दिन भी आएगा जब हिन्दी के एक ही अखबार के दस लाख पाठक होंगे।’ आज 2009 में दस लाख पाठक छोड़िए, दस लाख प्रतियों से कहीं ज्यादा बिकने वाले भाषाई अखबार निकल रहे हैं और अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। आए दिन नए-नए समाचार चैनल शुरू हो रहे हैं। अखबारों में प्रसार संख्या और चैनलों में टीआरपी के लिए गला-काट प्रतिद्वंद्विता छिड़ी है। लेकिन सामग्री (कंटेंट) और गुणवत्ता के स्तर पर हमारा ‘मीडिया’ आज कहाँ खड़ा है?

टीआरपी की जंग में हास्यास्पद बना दिए गए हिन्दी समाचार चैनलों को छोड़ दें और फिलहाल सिर्फ हिन्दी अखबारों की बात करें तब भी कंटेंट के मामले में उनकी स्थिति दयनीय दिखाई देती है।

हिन्दी के प्रमुख अखबार आज 20 से 32 पेज तक रोजना छाप रहे हैं। सुन्दर छपाई, डिजायन, लेआउट और मनोरंजक परिशिष्टों पर खूब जोर है, लेकिन दुख है कि लेखों-समाचारों-फीचरों की गुणवत्ता पर खास ध्यान नहीं है। प्रसार संख्या की होड़ ने स्थानीयता को खूब बढ़ावा दिया है और छह से आठ-दस पेज तक स्थानीय समाचारों से भरे रहते हैं, लेकिन इन समाचारों के विषय, उनकी तथ्यपरकता, भाषा और प्रस्तुतीकरण बचकाने लगते हैं। डॉ. कलाम संपादकों-पत्रकारों से शोध की अपेक्षा कर रहे हैं लेकिन यहाँ थोड़ी भी मेहनत से तथ्य जुटाकर समाचार को विश्वसनीय और स्तरीय बनाने की प्रवृत्ति का अभाव है। संपादकों ने भी जैसे बढ़ते प्रसार और मुनाफे को ही अपनी सफलता का एकमात्र मानदण्ड मान लिया है।

उत्तर प्रदेश में ‘हिन्दुस्तान’ के विस्तार के पिछले दो-तीन साल के दौरान सैकड़ों युवा पत्रकारों से मेरा मिलना हुआ।
गली-कूचों तक खुल गए मीडिया संस्थानों से निकले ये युवा जोश से लबरेज तो हैं लेकिन तथ्यों की पड़ताल और शोध से खबरों को स्तरीय और प्रभावशाली बनाने का जज्बा और भाषा की मर्यादा उन्हें सिखाये ही नहीं गये। शब्दों की व्याकरणविहीन-तथ्यविहीन बाजीगरी ही पत्रकारिता है- यह संदेश युवा पत्रकार ग्रहण कर रहे हैं तो सारा दोष हमारा है। उन्हें प्रशिक्षित और निर्देशित करने की जिम्मेदारी किसकी है।

अध्ययन-मनन, शोध और विश्लेषण की क्षमता विकसित किए बिना पत्रकारिता समृद्ध और प्रभावकारी कैसे बनेगी ? क्या हम डॉ. कलाम को सुन और समझ पा रहे हैं?

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