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पैसा और पद मुझे आकर्षित नहीं कर पाए

अमेरिका के एमआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से एमटेक और एमबीए करने के बाद वे न टेक्नोक्रेट बने और न कॉपरेरेट दुनिया की सीढ़ियां चढ़ीं। दीप जोशी ने अपनी इस शिक्षा का इस्तेमाल देश को खुशहाल करने के अपने सपने के लिए किया। इसी सपने के साथ वे भारत लौटे और गांवों में सक्रिय हो गए। खुद तो गांव में सक्रिय हुए ही साथ ही देश में प्रोफेशनल्स युवाओं को गांवों की ओर मोड़ने की एक मुहिम को भी शुरू किया। उन्होंने उन प्रोफेशनल्स को एक आदर्श दिया, जो इसके पहले तक शहरी जिंदगी में मोटी कमाई का सपना संजो रहे थे। इसी अनूठे काम के लिए उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार से नवाजा गया है। पुरस्कार की घोषणा के कुछ समय बाद ही दीप जोशी से रू-ब-रू हुए हमारे विशेष संवाददाता गुरुचरन।

आप करियर छोड़कर अमेरिका से वापस क्यों आ गए थे?  

मैंने अपने बचपन के 17 साल गांव में बिताए। शुरू से मुझ पर शायद घर परिवार से आइडियलिज्म हावी हो गया। पैसा व पद मुझे आकर्षित नहीं कर पाए। अमेरिका में पढ़ाई के दौरान भी मुझे अपना देश और गांव की बराबर याद आती रही। पढ़ाई पूरी होते ही मैं हिन्दुस्तान लौट आया।

काम की शुरुआत कैसे की?

यहां आकर मुझे अहमद नगर (महाराष्ट्र) के जमकेड हेल्थ प्रोजेक्ट के इवोल्यूशन का काम मिला, जिसे एक अमेरिकी डॉक्टर दम्पति ने शुरू किया था। इस प्रोजेक्ट की यह खासियत थी कि इस डॉक्टर दम्पति ने वहां के ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर काम किया और इस तरह वे गांव की महिलाओं को ट्रेंड करने में सफल रहे। इस प्रोजेक्ट ने हेल्थ सीन में काफी बदलाव किए। इससे बच्चों की मृत्यु दर में काफी कमी आई। उस काम से प्रभावित होने के बाद भी मेरे सामने ये सवाल था कि क्या मैं अकेला गांव जाऊं? मैंने तय किया कि एक संस्था के रूप में गांवों में जाया जाए। इस तरह प्रदान प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन संस्था अस्तित्व में आई।

प्रोफेशनल्स को गांवों में भेजने का अनुभव कैसा रहा?

हम प्रोफेशनल्स के साथ बातचीत करते हुए तय करते हैं कि किन युवाओं को गांवों में भेज जाए। गांव का अर्थ कई युवा यह समझते थे कि वे ब्लॉक या जिला टाउनशिप में रहकर काम करेंगे। लेकिन जब उन्हें पता चलता कि गांव में रहना होगा तो कुछ प्रोफेशनल्स एक साल की अप्रेंटिस बीच में ही छोड़ जाते थे।

कमिटेड प्रोफेशनल्स के लिए अच्छे माहौल की जरूरत कैसे पूरी की?

हमने अपने काम में पहले ही यह तय किया था, जो फील्ड में काम करने आया है काम के बारे में उसकी राय भी सुनी जाए, यानी उसकी सोच को इस्तेमाल करने की जगह भी मिलनी चाहिए। काम-काज में इंटरनल डेमोक्रेसी भी बहुत जरूरी है। उसे ये महसूस होना चाहिए कि इस काम में वह भी महत्वपूर्ण है और काम में उसकी भी सहमति ली जाती है। उन्हें गांव में रखते हुए हमें उन्हें दुनिया से काट कर नहीं, जोड़ कर रखते हैं। आज इस काम को इंटरनेट बढ़िया ढंग से निभा रहा है।

अभियान में स्त्रियों की भूमिका कैसी रही?

हमारी शुरू से ही इच्छा रही कि महिलाएं काफी संख्या में हमारे काम से जुड़ें। इसके लिए हमने ये भी सुविधा रखी कि महिलाएं अपने परिवार को अपने फील्ड में ले जा सकें और उनके परिवार वाले जान सकें कि वह किस माहौल में रह रही हैं। कृषि व तकनीकी शिक्षा में आज भी महिलाओं की संख्या कम है। ऑफिस में तो हमारे यहां महिलाएं काफी रहीं, लेकिन फील्ड में हम महिला प्रोफेशनल्स की संख्या 20 से 25 फीसदी से ज्यादा नहीं कर पाए। हमारे काम की शुरुआत महिलाएं करती हैं। हमारे साथ 11 हजार महिलाओं के ग्रुप हैं। महिला ग्रुप की पोल्ट्री कोऑपरेटिव का पिछले साल का 60 करोड़ रुपये का कारोबार रहा।

सरकार ग्रामीण विकास पर काफी खर्च करती है, लेकिन कुछ होता क्यों नहीं?

सरकार की रोजगार, भोजन, स्वास्थ्य जैसी अनेक अच्छी योजनाओं के बावजूद अनुकूल परिणाम नहीं दिखने की वजह से 30 से 40 फीसदी लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। सरकार बड़े मंसूबे बनाती है और खूब पैसा लगाती है। लेकिन देश में गरीबों की हालात बद से बदतर है। इस काम में सरकार एनजीओ से मदद ले सकती है। सरकार को अगर यह पता ही नहीं कि कौन सा एनजीओ सही है और कौन गलत तो आप समझ सकते हैं कि सरकार अपनी जिम्मेदारी के प्रति कितनी गंभीर हैं? सरकार को समझना चाहिए कि योजनाओं से दुनिया नहीं बदलती है।

रिटायर्ड लाइफ किस तरह जी रहे हैं?

मैंने जो भी तजुर्बे कमाए हैं, उन्हें अपने साथियों के अनुभवों के साथ शेयर करता हूं। प्रदान से रिटायर्ड हुए दो साल हो गए हैं। लेकिन उनके लिए व दूसरी संस्थाओं के लिए परामर्श देता हूं, इरमा व कई संस्थाओं के बोर्ड में हूं। इस तरह की व्यस्तताओं के चलते अभी भी जिंदगी से तजुर्बे कमा रहा हूं।

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