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जरूरी है आईआईटी का स्तर बढ़ाना

भारत में भी 10 से 15 इंजीनियरिंग संस्थान अमेरिका के बिग टैन और आईवी लीग की तरह ही श्रेष्ठ संस्थानों की श्रेणी में आते हैं। पहले दर्जे के भारतीय संस्थान हैं : पुराने भारतीय तकनीकी संस्थान और भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर। दूसरे दर्जे में लगभग पचास कॉलेज आते हैं, जिनमें प्रमुख हैं, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान और कुछ पुराने क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज। तीसरे दर्जे में वे हजारों कॉलेज हैं, जिनमें कुछ सरकारी मदद से चल रहे हैं और अधिकांश निजी संस्थान हैं।

भारत में हर साल ढाई लाख स्नातक स्तर के इंजीनियर निकलते हैं। इनमें से क्रमश: 5,000 और 15,000 पहले और दूसरे दर्जे के संस्थानों से आते हैं। बाकी तीसरे दर्जे के कॉलेजों से। अक्सर कहा जाता है कि इनमें केवल दस प्रतिशत इंजीनियर ही इस लायक होते हैं कि उन्हें चुनौतीपूर्ण कार्यों में लगाया जा सके। यह बहुत गंभीर आक्षेप है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि खासकर पहले दर्जे के संस्थानों का मूल्यांकन खास तौर पर किया जाए और इसके लिए तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई भी की जाए।

पहले दर्जे की संस्थाओं में अनेक क्षमताए होती हैं। यहां आने वाले छात्रों में जबरदस्त गुणवत्ता होती है। चार लाख से अधिक छात्रों ने मई, 2009 में आयोजित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में भाग लिया था और दो  प्रतिशत से भी कम परीक्षार्थियों को प्रवेश मिल पाया था। यदि तुलना की जाए तो हम पाएगे कि सामान्यत: दस में से एक परीक्षार्थी ही विश्व के पश्चिमी भाग की प्रतिष्ठित संस्थाओं में प्रवेश पाने में सफल होता है। यदि हाईस्कूल के परीक्षा परिणामों को मिलाकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की संयुक्त प्रवेश परीक्षा को भारत के सभी इंजीनियरिंग संस्थानों का मुख्य प्रवेश बिंदु बना दिया जाए तो छात्र बहुत-सी परेशानी और खर्चे से बच जाएगे।

पहले दर्जे के संस्थानों के पाठ्यक्रम में विज्ञान, मानविकी और समाज विज्ञान का भी समावेश होने के कारण वे काफी व्यापक होते हैं। पाठ्यक्रम भी निरंतर विकसित होता रहता है और संकाय सदस्य भी ज्ञान के विस्फोट और बदलती हुई औद्योगिक आवश्यकताओं के अनुरूप इसकी नियमित पुनरीक्षा करते रहते हैं। इन संस्थानों के संकाय सदस्यों ने भी भारत और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ संस्थाओं से एक या अधिक डिग्री ली होती हैं। इसलिए पाठ्यक्रम के निर्माण और अनुसंधान से संबंधित शैक्षणिक क्षेत्र में उनका सर्वश्रेष्ठ अनुभव होता है। भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रचलित भाई-भतीजावाद इन संस्थाओं में न के बराबर है।

प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा राष्ट्रीय प्राथमिकता के अंतर्गत आती है। यही कारण है कि सरकार इन क्षेत्रों में भारी निवेश करती है। यह लाभ सभी अन्य इंजीनियरिंग कॉलेजों को नहीं मिलता। साथ ही इन संस्थाओं की छवि बहुत बढ़िया होती है और यहा के पूर्व छात्र भारी मात्रा में दान भी देते हैं। इन संस्थाओं के सामने अनेक अवसर और बाधाए भी होती हैं। ये संस्थाए दूसरे और तीसरे दर्जे के कॉलेजों के लिए ठीक उसी तरह आदर्श होती हैं, जैसे एमआईटी, स्टैनफोर्ड, कैलटैक, कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्व भर की संस्थाओं के लिए आदर्श रहे हैं। नए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों को आरंभ से ही अध्यापन और अनुसंधान के क्षेत्र में श्रेष्ठता की वही संस्कृति विकसित करने का अच्छा अवसर मिलता है, जो पुराने संस्थानों को मिला करता था। दूसरे और तीसरे दर्जे की संस्थाओं के अध्यापकों को यहां डॉक्टरेट के लिए प्रतिनियुक्त किया जा सकता है ताकि वे पाठ्यक्रम, शिक्षाशास्त्र और अनुसंधान की विशेषताओं को अपनी संस्था में ले जा सकें। इससे न केवल पहले दर्जे के संस्थानों को अपेक्षित संख्या में स्नातकोत्तर छात्र मिल सकेंगे, बल्कि दूसरे और तीसरे दर्जे के संस्थानों को योग्य अध्यापकों का लाभ भी मिल सकेगा। सरकार को ऐसे कार्यक्रमों में निवेश करना चाहिए।

पहले दर्जे के संस्थानों की दिक्कत यह है कि इनमें अध्यापकों की संख्या, उनकी गुणवत्ता और उच्च स्तरीय शोध काफी कम है। धीरे-धीरे स्वायत्तता भी घटने लगी है। 2004 में गठित रामाराव समिति ने इन संस्थानों में संकाय सदस्यों की भारी कमी की ओर ध्यान आकृष्ट किया था। 1960 के दशक में पाच आईआईटी ने अधिकतर विदेशों से भारी संख्या में भर्ती की थी। भावी संभावनाओं और चुनौतियों को देखते हुए अब भी यही किया जा सकता है। जे. सी. बोस स्कीम के अंतर्गत शीर्षस्थ अध्यापकों और अनुसंधानकर्मियों को आर्थिक अनुदान देना इस दिशा में सही कदम है। सर्वश्रेष्ठ अध्यापन के लिए आकर्षक नकदी पुरस्कार दिए जा सकते हैं। अन्य प्रोत्साहन भी दिए जा सकते हैं।

अगर प्रतिष्ठित विदेशी संस्थानों से तुलना की जाए तो अनुसंधान के मामले में पहले दर्जे के ये संस्थान कहीं नहीं ठहरते। स्नातकोत्तर स्तर के छात्र अत्यंत परिश्रमी होते हैं, फिर भी संकाय सदस्य उन्हें प्रेरित करने में असमर्थ रहते हैं। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि कुछ संकाय तो पूरे दशक में एक पीएचडी भी तैयार नहीं कर पाते। पीएचडी की संख्या में हर हाल में वृद्घि की जानी चाहिए, भले ही कतई कोई परिणाम न दिखाने वाले संकाय सदस्यों को या तो स्वैच्छिक रूप से विदा होना पड़े या फिर किसी और तरीके से उनसे पिंड छुड़ाया जाए। कुछ निकम्मे संकाय सदस्यों को कुछ समय के लिए विदेश के किसी अनुसंधानकर्ता विश्वविद्यालय में या फिर किसी औद्योगिक संस्थान में भेजकर उनकी बैटरी को रीचार्ज किया जा सकता है। इससे उनमें नए उत्साह का संचार हो सकेगा।

उदारीकरण के साथ ही देश में घरेलू शोध की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जाने लगी है। दुनिया भर की कई छोटी बड़ी कंपनिया भी बौद्घिक क्षमता और कम लागत का ध्यान रखते हुए भारत में ही अनुसंधान व विकास केंद्रों की स्थापना करने लगी हैं। इन सभी कार्यों से पहले दर्जे की संस्थाओं से निकली प्रतिभाओं के लिए चुनौतीपूर्ण अवसर और संभावनाओं के द्वार खुलने लगे हैं। इसी से भारत को वैश्विक ज्ञानपरक अर्थव्यवस्था में अपना उचित स्थान प्राप्त हो सकेगा।

पिछले कुछ वर्ष में इन उच्च संस्थाओं की स्वायत्तता में कमी होने लगी है, चाहे फिर वह छात्रों के प्रवेश में कोटे का सवाल हो या संकाय-सदस्यों की भर्ती हो या फिर छात्रों की दानराशि का मामला हो। एक ऐसी संस्था का गठन किया जाना चाहिए जिसमें इन श्रेष्ठ संस्थाओं के अध्यक्षों और निदेशकों के अलावा उद्योग और वैज्ञानिक संस्थाओं के कुछ अगुवा लोगों को तो शामिल किया जाए, लेकिन सरकार का प्रतिनिधित्व कम से कम हो।

लेखक आईआईटी, कानपुर के डीन और टाटा अनुसंधान विकास व डिजाइन केंद्र, पुणे के संस्थापक निदेशक रह चुके हैं। "युनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के सेंटर फॉर द एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया के सहयोग से प्रकाशित।" इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में आप इस साइट पर पढ़ सकते हैं-
http : //casi.ssc.upenn.edu

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