DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बुरा मानो या भला : शब्दों से मत खेलो भाई

मैंने बहुत कोशिश की कि हिंदुत्व का मतलब समझ जाऊं? लेकिन कामयाब नहीं हो सका। लालकृष्ण आडवाणी उसे ‘उत्तम विचार’ मानते हैं। बिना यह साफ किए कि उसमें उत्तम क्या है? गोविंदाचार्य को कट्टरपंथी हिंदुओं का बेहतरीन दिमाग माना जाता है। वह एक लंबी सफाई देते हैं। यानी हर किसी के साथ अच्छा व्यवहार, न्याय और कानून का राज वगैरह-वगैरह। यह तो किसी भी पार्टी के एजेंडे में शामिल हो सकता है। अब बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह नयी बात कहते हैं। उनका मानना है कि ¨हदुत्व का नरम विकल्प भी है। वह है बंधुत्व। यहां गौर करना चाहिए। राजनाथ सिंह मान रहे हैं कि हिंदुत्व का मूल विचार थोड़ा कठोर है। उसे नरम बनाने की जरूरत है। मेरा कहना है कि क्यों न हिंदुत्व को छोड़ कर इंदुत्व की बात की जाए। यानी, इंडियनाइजेशन की।

शब्दों के जाल में फंसने की जगह मुझे कुछ सवाल उठा लेने दीजिए। ये सवाल आडवाणी, गोविंदाचार्य और राजनाथ सिंह से हैं। इनके जवाब हां या ना में हो सकते हैं। मैं बेहद आसान सवाल कर रहा हूं। वह भी इसलिए कि ज्यादातर लोग समझते हैं, ये उनके छिपे एजेंडे का हिस्सा नहीं हैं। पहला, क्या आपके हिंदुत्व या बंधुत्व में बाबरी मस्जिद वाली जगह राम मंदिर बनाने की बात शामिल है?

दूसरा, क्या और भी मस्जिदें हैं, जिन्हें ढहाना आपके एजेंडे में है। एक वक्त आप दो और मस्जिदों की बात करते थे यानी बनारस और मथुरा की।

तीसरा, क्या आप देश भर में गौ हत्या बंद करा देंगे? चाहे गौमांस खाने वाला समाज राजी हो या न हो।

चौथा, क्या आप हिंदू से इस्लाम या ईसाई होने पर पाबंदी लगा देंगे। लेकिन इस्लाम और ईसाई से हिंदू होने की मंजूरी दे देंगे।

मेरी दिल्ली

कई महीनों की तन्हाई के बाद मैं अपने छोटे से अपार्टमेंट से बाहर निकला। मैं अपने शहर को देखना चाहता था, जहां मैंने अपनी जिंदगी के 94 सालों का ज्यादातर वक्त बिताया। अपने दांतों के डॉक्टर सिद्धार्थ मेहता के यहां जाने से बेहतर और क्या हो सकता था। वह पहले मेरे घर की सड़क के पार खान मार्केट में थे। लेकिन अब वसंत विहार चले गए हैं।

मेरे पास न तो अब कोई कार है और न ही ड्राइवर। मुझे अपनी भतीजी गीता के साथ ही लद कर जाना था। मुझे उम्मीद थी कि 15-20 मिनट में पहुंच जाएंगे। लेकिन करीब 45 मिनट लगे। सड़क फंसी हुई थी। थोड़ी-थोड़ी देर में ट्रैफिक रुक जाता था। मैं शहर में आए बदलावों को देखता रहा।

मुझे लगा कि शहर में हरियाली बढ़ गई है। हालांकि यह भी महसूस हुआ कि फूलों के पेड़ कुछ कम हैं। अपने दूसरे दौर में खिलते अमलतास जरूर दिखलाई पड़े। कई दीवारें मुझे जमुनी बोगनविला से लदी नजर आईं। रास्ते के तमाम घर मुझे खुशहाल नजर आ रहे थे। कोई हॉकर नहीं, कोई कूड़ा-कर्कट नहीं। गली के कुत्ते भी नहीं। मुझे अपने शहर पर फख्र हुआ। मैंने मन ही मन शीला दीक्षित को बेहतर काम करने के लिए आशीर्वाद दिया।

एक ही गड़बड़ी मुझे नजर आई, वह ट्रैफिक को ले कर थी। ढेरों गाय मुझे दिखलाई पड़ीं। कुछ सड़कों को देख कर लगा कि उन्हें चौड़ा नहीं किया जा सकता। फ्लाईओवर जाम को रोक पाने में नाकामयाब रहे हैं। इस बारे में कुछ किया जाना चाहिए नहीं तो शहर घुट कर मर जाएगा। क्या करना चाहिए? वह मैं नहीं सोच पाता।

मैं सोचता हूं कि क्या आने वाले वक्त में हमारे हर इलाके में पॉलिक्लिनिक होंगे? वहां हर तरह के डॉक्टर होंगे। ये हर किसी की पहुंच में होंगे। अब जिन लोगों के पास कार नहीं है या जिन बुजुर्गों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भी दिक्कत होती है। वे यों ही टहलते हुए पहुंच जाएं। ये मेरे लिए सपने जैसा है।

डॉ. मेहता के यहां वैसे ही भीड़ थी, जैसी खान मार्केट में होती थी। मुझे अपनी बारी के लिए अच्छा-खासा इंतजार करना पड़ा। मैं वहां बैठा बार-बार सोचता था कि काले संगमरमर की सीढ़ियों से मैं कैसे उतर पाऊंगा? लेकिन जो हुआ उससे मैं चकित ही हुआ।

डॉ. मेहता मेरे साथ सीढ़ियों तक आए। एक कदम आगे थे वह। उन्होंने एक पैडल स्विच किया। एक प्लेटफॉर्म निकल आया। वह मेरे लेवल पर आ गया। मैं उस पर खड़ा हुआ और बाहर आ गया। मेरे खयाल से यह 21 वीं सदी की दिल्ली है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बुरा मानो या भला : शब्दों से मत खेलो भाई