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भादों गया सारा आली

आषाढ़ और सावन दोनों निकल गए। भादों आ गया है। एक गाना याद आता है, मेरे नयना सावन भादों..और मैं परेशान सा बादलों को तलाशने लगता हूं। सावन भादों में भी पानी नहीं है। बारिश कहीं रूठ कर बैठ गई है। कहां चले गए मेघ कृष्ण? कृष्ण कन्हैया यह तो आपका ही महीना है। उसी तरह जैसे सावन शिव का महीना है। इसी महीने में ही तो आप जन्मे थे। बारिश के झमाझम महीने में आपका जन्म हुआ था। लेकिन यह कैसा समय चल रहा है, जहां बारिश को तरस गए हैं हम। आषाढ़ और सावन के महीने निकल गए और कायदे से दो दिन बारिश नहीं हुई। भादों आ गया है और हम मेघ कृष्ण को ढूंढ़ रहे हैं। कुछ-कुछ उसी तरह जैसे गोपियां ढूंढती थीं, अपने कृष्ण को। ब्रज के एक बारहमासा में भादों में राधा की क्या हालत है, जरा देखिए तो सही-
भादौं भवन नींद नहिं आव, मोरा बोलै यहां मधुवन में रे।
कोयल है कै बन-बन डोलूं, सूखे ताल वृंदावन के रे। हमको छोड़ चलै बैनी माधौ, राधा विचार करै मन में रे।

राधा अपने कृष्ण को ढूंढ रही हैं और हम मेघ कृष्ण को। दोनों ही प्यासे हैं। प्रभु आप कहां हैं? आप हमें सूखे की भ्‍ोंट क्यों चढ़ाना चाहते हैं? हमारे अंदर भी सूखा है और बाहर भी। और वह आपके बिना नहीं मिट सकता। हमारी प्यास तो आप ही मिटा सकते हैं।

भादों है, अब तो बरसो मेघ कृष्ण। आपकी प्रकृति ही बरसने वाली है। तन मन को भिगोने वाली है। आप अपनी प्रकृति के खिलाफ क्यों जा रहे हैं प्रभु। मेघ कृष्ण का तो मतलब ही है बरसना। जोर से छाना और झमाझम बरस जाना। लेकिन ये आप क्या कर रहे हैं? हल्की-फुल्की आपकी झलक मिलती है। जब लगता है कि आप छाने वाले हैं, तो आप अचानक गायब हो जाते हो। आप छा कर भी बरसते क्यों नहीं? कौन आपको उड़ा ले जाता है प्रभु। गोपियों की पीड़ा अपनी लगने लगती है,

ना रही बदन में लाली। बिन जोर देह भई खाली।
भादों गया सारा आली। सुध न लीनी वनमाली।।
अब तो सुध ले लो प्रभु। अब तो बरसो। भादों को भिगो दो प्रभु।

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