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फैसले का वक्त

जजों की परिसंपत्तियों पर पारदर्शिता कायम करने की बहस चल ही रही थी कि विधि आयोग ने अपनी ताजा रपट में सुप्रीम कोर्ट को काम ज्यादा और आराम कम करने की सलाह दे डाली है। हालांकि विधि आयोग के सुझाव बाध्यकारी नहीं होते, पर वे न्यायिक व्यवस्था और मौजूदा कानूनों में सुधार के ऐसे दिशा-निर्देश देते हैं, जो भविष्य के लिए बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं। आयोग के यही सुझाव कई बार न्यायालय के निर्णय और न्यायिक सुधार का आधार बनते हैं। आयोग ने सरकार के अन्य विभागों से तुलना करते हुए जो हिसाब लगाया है, उसके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के जज साल में महज 190 दिन काम करते हैं, जबकि सरकारी दफ्तर 245 दिन खुले रहते हैं। सर्वोच्च होने के विशेषाधिकार के चलते  उनकी छुट्टियां न्यायपालिका के अन्य हिस्सों के मुकाबले भी ज्यादा हैं। निचली अदालत के जजों को अगर 24 दिन और हाईकोर्ट के जजों को 30 दिन की गर्मी की छुट्टी मिलती है तो उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्तियों के लिए 50 दिन की गर्मी की छुट्टी उपलब्ध है। आयोग ने 50 हजार लंबित मुकदमों के लिए इसे बड़ी वजह मानते हुए यह सुझाव दे डाला है कि उन्हें अपनी छुट्टियां 10 से 15 दिन कम करनी चाहिए और प्रतिदिन काम का समय आधे घंटे बढ़ाना चाहिए। लेकिन जजों की नियुक्तियों और अपनी सेवा शर्तो को बनाने का जो विशेषाधिकार न्यायपालिका को मिला हुआ है, उसे देखते हुए उस पर सरकार की तरफ से किसी नियम के थोपे जाने से कार्यपालिका और न्यायपालिका में टकराव की स्थितियां पैदा हो सकती हैं। पर लोकतंत्र के विस्तार और अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ न्यायालय पर जिस तरह विश्वास बढ़ा है, और बड़ी संख्या में लंबित मुकदमे जिसके प्रमाण हैं, उसे देखते हुए स्वयं न्यायपालिका को इस दिशा में आत्ममंथन और पहल करनी चाहिए।

इसी तरह आयोग की यह टिप्पणी कि द्विविवाह इस्लाम की मूल भावना के खिलाफ है, समाज में नए तरह का टकराव पैदा कर सकती थी, अगर उन्होंने मुस्लिम कानून में संशोधन का सुझाव दिया होता। पर गनीमत है कि उन्होंने धार्मिक नेताओं का ध्यान रखते हुए स्वयं को उसके समाजशास्त्रीय पक्ष तक ही सीमित रखा है। विधि आयोग की इस टिप्पणी में भी यही भाव निकलता है कि न्यायपालिका की तरह ही मुस्लिम समाज को अपने भीतर बदलाव की पहल करनी चाहिए।

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