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बैतुल्ला के बाद

पाकिस्तान के तालिबान कमांडर बैतुल्ला महसूद के अमेरिकी मिसाइल हमले में मारे जाने से अफगानिस्तान में जूझती नाटो सेनाओं को तो कोई खास फायदा नहीं मिलेगा लेकिन पाकिस्तान के लिए यह बड़ी राहत है। महसूद एक कुशल रणनीतिकार होने के साथ-साथ अच्छे संगठक भी थे, जिन्होंने तरह-तरह की कबीलाई सेनाओं को एक साथ जोड़ा था और साथ ही अफगानिस्तान के तालिबान से भी अच्छा तालमेल बनाए रखा था। महसूद का प्रभाव क्षेत्र जिस इलाके में था, उससे अफगानिस्तानी तालिबान को भी मदद दी जा सकती थी, और अब भी पाकिस्तानी सेना के लिए उस पर अपना नियंत्रण करना आसान नहीं होगा, क्योंकि वह इलाका दुर्गम है और तालिबान के हजारों लड़ाके वहां मौजूद हैं। ऐसे में जहिर है कि महसूद को जमीनी लड़ाई में मार गिराना पाकिस्तानी सेना के लिए तकरीबन नामुमकिन था और उसे अमेरिकी हवाई हमले में ही मारा जा सकता था। अमेरिका की रणनीति यह है कि पाकिस्तानी क्षेत्र में हवाई हमलों से तालिबान को कमजोर किया जाए ताकि जब अफगानिस्तान में तालिबान पर दबाव बनाया जाए तो वे पाकिस्तान से शरण और मदद न पा सकें। लेकिन महसूद की मौत का एक परिणाम यह हो सकता है कि बदले में तालिबान पाकिस्तान के अंदर आतंकवादी कार्रवाइयां तेज कर दें और पाकिस्तानी जनमत सरकार के विरुद्ध उग्र हो जाए। ऐसे में अमेरिकी रणनीति की सफलता पाकिस्तानी सेना के सहयोग पर बहुत निर्भर करेगी। अगर पाकिस्तानी सेना नागरिक सरकार के पक्ष में डटी रहती है और तालिबान के खिलाफ कार्रवाई जारी रखती है तो तालिबान कमजोर हो जाएंगे। ऐसे में पाकिस्तान पर तालिबान का दबाव कम होगा और अमेरिकी अफगानिस्तान में ज्यादा जोर लगा पाएंगे। इस मामले में पाकिस्तान-अफगानिस्तान में आतंकवाद विरोधी युद्ध अपने निर्णायक दौर में पहुंच रहा है। इस वक्त महत्वपूर्ण यही है कि पाकिस्तानी सेना में मौजूद तालिबान समर्थक तत्व तालिबान पर दबाव हल्का न होने दें, वरना किसी दूसरे कमांडर के नेतृत्व में वे फिर उतने ही मजबूत हो सकते हैं। भारत को भी हर वक्त सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि आतंकवादी हमेशा भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ाने के लिए आतंकी वारदात कर सकते हैं।

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