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दीया लेकर ढूंढ़ रहे बिजली, 5000 किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइन


सूबे में ट्रांसमिशन लाइन तो तैयार हैं लेकिन बिजली ही गायब है। इस समय ऊर्जा सुधार कार्यक्रम के बाद राज्य में 1500 किलोमीटर नई ट्रांसमिशन लाइन बनकर पूरी हो चुकी है लेकिन बिजली आपूर्ति में कोई बढ़ोतरी नहीं हो पाई है।

बिहार में पहले से 3500 किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइन है। ऐसे में इस समय राज्य में जो सिस्टम तैयार है उससे करीब 3000-3500 मेगावाट बिजली की आपूर्ति हो सकती है जबकि उपलब्धता मात्र एक हजार मेगावाट की है। हालांकि परेशानी डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम को लेकर है।

बिहार में बिजली आपूर्ति का डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम पूरी तरह लचर है। ग्रिड सब स्टेशन से लेकर पावर सब स्टेशन तक की क्षमता काफी कम है और वह ओवर लोडेड है अर्थात वहां क्षमता से अधिक बिजली की मांग है। पावर सब स्टेशन में जितनी बिजली आती है उतने में ही वह हांफने लगता है जबकि उपभोक्ताओं की मांग उससे अधिक बिजली की है। ये सब स्टेशन मांग पूरा कर सकने में सक्षम नहीं हैं। यही नहीं ट्रांसमिशन लाइन तो दुरुस्त हो गए हैं लेकिन पावर सब स्टेशन उस अनुरूप तैयार नहीं हुए हैं। इस हिसाब से बिहार में सब स्टेशनों की भारी कमी है।

इसके कारण शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी मांग के अनुसार बिजली की आपूर्ति नहीं हो पाती है। इस हिसाब से कम बिजली उपलब्ध होने के बावजूद उसे ढंग से लोगों तक पहुंचाने में परेशानी हो रही है। बिहार में पिछले छह वर्षो से बिजली सुधार का कार्यक्रम चल रहा है। पावरग्रिड ने फेज एक में 1000 किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइन बनायी, जबकि 16 ग्रिड बने।
सेकेंड फेज में अब तक 400 से 500 किलोमीटर ट्रांसमिशन लाइन बन चुकी है। इसके आधार पर बिहार में इस समय कम से कम 3000-3500 मेगावाट बिजली को इधर से उधर किया जा सकता है लेकिन सूबे के निवासी अब भी दिया लेकर बिजली ढूंढ़ने को विवश हैं।

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  • Web Title:ट्रांसमिशन लाइन तैयार पर बिजली कहां?