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निजी कॉलेजों में 50 फीसदी आरक्षण पर रोक

गैर वित्तीय सहायता प्राप्त तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पचास फीसदी आरक्षण लागू करने के 22 जून के शासनादेश के अमल पर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए शनिवार से शुरू होने वाली काउंसिलिंग पर आरक्षण के सरकारी आदेश का कोई प्रभाव नहीं होगा। लेकिन काउंसिलिंग पीठ के पिछले आदेश के अनुरूप जारी रहेगी तथा अदालत के अग्रिम आदेश पर निर्भर करेगी।

न्यायमूर्ति प्रदीपकांत तथा न्यायमूर्ति रितुराज अवस्थी की खण्डपीठ ने सरकार की ओर से उपस्थित हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पीएस पटवलिया के आग्रह पर मामले की अगली सुनवाई के लिए 12 अगस्त की तारीख निश्चित की है और उस रोज भी प्रमुख सचिव बृन्दास्वरूप तथा उ.प्र. तकनीकी विश्वविद्यालय के निबंधक यूएस तोमर को अदालत के समक्ष उपस्थित रहने का आदेश दिया है।

विजय कुमार सिंह परमार व सेवानिवृत्त प्रोफेसर अजय स्वरूप की ओर से दायर दो याचिकाओं पर पारित आदेश में पीठ ने कहा है कि ऐसे निजी संस्थान, जिनके बारे में सरकार का दावा है कि वे आरक्षण लागू करने के लिए राजी हो गए हैं, उनमें आरक्षण जरूर लागू किया जा सकता है। पर ऐसा कोई राजीनामा अदालत के सामने पेश नहीं किया गया।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन संस्थाओं को इस शर्त पर सम्बद्धता प्रदान की गई है कि वे अपने यहाँ पचास फीसदी आरक्षण लागू करेंगे, उनमें भी काउंसिलिंग के लिए आरक्षण की स्वीकृति के कोई मायने नहीं होंगे।
शुक्रवार को सुनाए गए चार पृष्ठ के आदेश में अदालत ने कहा है कि इस हाईकोर्ट ने पूर्व में दायर कई याचिकाओं पर गैर वित्तीय सहायता प्राप्त निजी शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण पर रोक के अन्तरिम आदेश जारी किए थे।

सरकार ने इन आदेशों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की, जो खारिज कर दी गई। सरकारी अफसर और सरकार के वकील यह बताने में नाकाम रहे हैं कि इस हालत में आखिर सरकार ने अदालती आदेश की अवज्ञा करते हुए 22 जुलाई 2009 का 50 फीसदी आरक्षण का विवादित शासनादेश कैसे जारी कर दिया।

अदालत यह समझ पाने में नाकाम रही कि अन्तरिम आदेश के बावजूद इन संस्थाओं को आरक्षण लागू करने के लिए कैसे विवश किया जा सकता है। इस तर्क का, कि कुछ निजी संस्थान आरक्षण लागू करने के लिए राजी हो गए, मतलब यह नहीं लगाया जा सकता कि जिन संस्थाओं ने अपने यहाँ आरक्षण लागू करने के सरकार के फैसले को अदालत में चुनौती दी और जिनके पक्ष में अदालत ने अंतरिम आदेश जारी किया, वे भी इनमें शामिल हैं। वैसे भी सरकार अदालत में 28 नवम्बर 2008 की बैठक के मिनट्स प्रस्तुत करने के अलावा कोई राजीनामा पेश नहीं कर सकी।

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