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अपराध का पौरुष

दिल्ली और उसके आस-पास बढ़ते अपराधों में महिलाओं के विरुद्ध अपराध विशेष प्रतिक्रिया की मांग करते हैं। हम इन्हें अन्य अपराधों के तराजू में इसलिए नहीं तौल सकते, क्योंकि इसमें लालच, क्रूरता और प्रतिशोध के अलावा एक खास तरह की उत्पीड़क मानसिकता काम करती है, जो स्त्री को उसके स्त्री होने के नाते ज्यादा क्षति पहुंचाती है। इस मानसिकता के चलते अकेली स्त्री को शिकार बनाना पुरुष के लिए बड़ा आसान होता है और इससे अपराध का पौरुष स्थापित होता है। पत्रकार सौम्या विश्वनाथन 2सितंबर 2008 को दिल्ली के नेल्सन मंडेला रोड पर इसलिए मारी गई, क्योंकि वह रात की सुनसान सड़क पर किसी पुरुष की कार से होड़ कर रही थी। इसी तरह आई टी मैनेजर जिगीशा घोष 18 मार्च 200ी रात को वसंत बिहार स्थित अपने घर में घुसे इससे पहले एटीएम कार्ड छीनने के लिए उसे उठा लिया गया और बाद में फरीदाबाद में उसकी लाश मिली। सामान्य पुरुषवादी तर्क है कि यह सब लड़कियां रात में काम करती थीं और उन्होंने अपने डय़ूटी समय के अनुसार अहतियात नहीं बरता था। एक क्षण के लिए इस तर्क को मान भी लिया जाए तो सवाल यह है कि तब फिर गाजियाबाद के एक गांव में दिन के ग्यारह बजे अपने घर में बैठी युवती को तीन युवकों ने मिट्टी का तेल डाल कर क्यों जला दिया? सुरक्षा तंत्र कारण यह बताता है कि उसने बलात्कार का विरोध किया था। यानी स्त्री अगर घर से बाहर निकल कर कुछ करती है तो असुरक्षित है और अगर घर में भी बैठी रहती है और अत्याचार का विरोध कर तब भी सुरक्षित नहीं है। मान लीजिए शहर का बेगानापन अपराध को अपने पांव पसारने का ज्यादा मौका देता है, पर गांव का छोटा और परिचित समाज भी क्या वैसे ही मौके नहीं देता है। स्त्री के खिलाफ होने वाले इन अपराधों में एक बात जो समान देखी जा रही है, वह है स्त्री के स्वाभिमान को कुचलने की कोशिश। इसीलिए अपराधी जिस अपराध की योजना बना कर आता है, उससे बड़े अपराध कर के जाता है। सबल होती स्त्रियों का तेज होता संघर्ष भी बढ़ती हिंसा की वजह है। इसलिए आज जरूरत सुरक्षा के पुरुषवादी तर्को से मुक्त हो कर स्त्री की सुरक्षा के सवाल को स्त्रीवादी नजरिए से देखने और सही सुरक्षा व्यवस्था संयोजित करने की है।ं

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