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साझी संस्कृति गालिब अकादमी की

साझी संस्कृति गालिब अकादमी की

उर्दू की साझी संस्कृति और गालिब की तहजीब का यदि कोई केंद्रबिंदु है तो वह है गालिब अकादमी। 1969 में जब भारत के राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ने इसकी आधारशिला रखी थी, तभी से यह स्थान दिल्ली की सांस्कृतिक गतिविधियों जैसे मुशायरों, पुस्तक विमोचनों, सेमिनारों आदि का केन्द्र बना हुआ है।

1969 के बाद शायद ही कोई ऐसा राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हो, जो गालिब अकादमी में न गया हो। इसका पुस्तकालय दिल्ली में अपना विशेष स्थान रखता है, क्योंकि उर्दू संस्कृति के सम्बंध में यहां जो सामग्री उपलब्ध है, वह दिल्ली के किसी भी पुस्तकालय में नहीं है। यहां पर सैकड़ों साल पुरानी उर्दू, फारसी, अरबी और हिन्दी की पुस्तकें मौजूद हैं, जिनसे शोध छात्र लाभ उठाते हैं।

बकौल डॉ. अकील अहमद, गालिब अकादमी में मात्र मुशायरे व अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां ही नहीं होतीं, बल्कि उर्दू भाषा को सिखाने की कक्षाएं भी लगती हैं, जिनमें आठ से अस्सी वर्ष के गैर मुस्लिम लोग भी उर्दू सीखते हैं। इस प्रकार के बहुत से उर्दू केंद्र गालिब अकादमी ने सारी दिल्ली में खोल रखे हैं, जहां से सैकड़ों लोग प्रत्येक वर्ष उर्दू सीख रहे हैं। यही नहीं, गालिब अकादमी में खत्ताती अर्थात लिखाई कला के सुंदर प्रदर्शन का पाठ-पठन भी होता है। दिल्ली के नामचीन खत्तात अनीस अहमद सिद्दीकी भी यहां खत्ताती की कक्षाएं लेते हैं। प्रत्येक वर्ष यहां खत्ताती की नुमाइश भी लगती है। यहां पर एक आर्ट गैलरी भी है, जहां एम.एफ. हुसैन, सतीश गुजराल और अनीस फारुकी द्वारा बनाए गए कला चित्र भी हैं।

गालिब के गैर उर्दू हिन्दी भाषी अनुयायियों के लिए डॉ. अकील अहमद ने एक बहुत अच्छा काम यह कर दिया है कि यहां पर ‘दीवान-ए-गालिब’ को उन्होंने उर्दू में अनुवादित कर दिया है और उसकी कीमत भी बहुत कम रखी है। इससे गालिब के चाहने वालों को बड़ा संतोष मिला है। यहां पर कई भाषाओं के अखबार एवं पत्रिकाएं भी उपलब्ध हैं।गालिब अकादमी के बाहर बड़ी चहल-पहल रहती है, क्योंकि सामने ही तबलीगी जमाअत का दफ्तर है, बगल में मजार-ए-गालिब है और निकट में ही सुलतान-उल-मशायख हजरत निजामुद्दीन औलिया का मजार भी है। यहां पर प्रसिद्ध करीम होटल भी है। पास में ही निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड भी हैं। कभी उस तरफ जाना हो तो गालिब अकादमी अवश्य जाएं।

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