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‘श’ से शिक्षा, ‘अ’ से अधिकार

हमारे देश की संसद ने आखिर आजादी के बासठ साल बाद गरीब बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मूलभूत अधिकार देने वाला शिक्षा अधिकार बिल पारित कर दिया है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद यह कानून का रूप ले लेगा, और इसे लागू करना सरकार की जिम्मेदारी हो जाएगी। इसमें कोई शक नहीं कि यूपीए-2 सरकार ने ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाकर लंबे अरसे से चली आ रही शिक्षाविदों और गैर-सरकारी संगठनों की मांग को पूरा कर दिया है, लेकिन सरकार असली परीक्षा में तभी पास होगी, जब इसे ठीक से लागू करके भावी नागरिकों का जीवन संवारने में कामयाब हो जाएगी।

छह से चौदह वर्ष की आयु के देश के सभी नौनिहालों, विशेषकर कमजोर वर्ग के बच्चों को कक्षा आठ तक अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा पाने का अधिकार देने वाले विधेयक को संसद द्वारा पारित कर दिए जाने को बेशक मील का पत्थर कहा जाएगा। यह बिल लंबे समय से संसद से हरी झंडी पाने की बाट जोह रहा था। अब तक देश में कमजोर वर्ग के करोड़ों बच्चों को गरीबी की वजह से शिक्षा से वंचित रह जाना पड़ता था, लेकिन मुफ्त शिक्षा अधिकार बिल के कानून बन जाने के बाद उनके अभिभावकों को उन्हें अपने निवास के निकटवर्ती स्कूल में भर्ती कराने में आसानी होगी। इस विधेयक को बेहद जोर-शोर से पारित कराने का बीड़ा उठाने वाले केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के शब्दों में, ‘हमारा देश अब अपने बच्चों के अनपढ़ रह जाने का भार नहीं ढो सकता।’

चार साल से था जिसका इंतजार

अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा कानून के अंतर्गत शिक्षा से जुड़े कुछ अन्य प्रावधानों को भी स्पष्ट किया गया है। इसमें प्राइवेट ट्यूशन पर प्रतिबंध, डोनेशन और शारीरिक दंड पर रोक जैसे मामले प्रमुख हैं। साथ ही, इसमें बच्चों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से बचाने का भी प्रावधान किया गया है। कक्षा आठ तक किसी भी विद्यार्थी को कक्षा से निकालने या फेल करने को भी गैरकानूनी बना दिया गया है।

गौरतलब है कि इस कानून को लागू करने की जो कवायद वर्ष 2005 में शुरू हुई थी, उसमें उपेक्षित बच्चों की श्रेणी में विकलांगों को भी शामिल किया गया था। अब बिल पारित होने के बाद इस श्रेणी को व्यापक तौर पर स्पष्ट किया गया है। इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति, क्षेत्र, लिंग के आधार पर उपेक्षित बच्चों को परिभाषित किया गया है जबकि विकलांग बच्चों को उपेक्षित नहीं माना गया था। यह बताना भी जरूरी है कि विकलांग बच्चों को उपेक्षित बच्चों की श्रेणी में रखने की सिफारिश स्वयं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने की है। जिसके बाद जाहिर है कि यह कानून बनने के बाद विकलांग बच्चों को इसमें शामिल किया जाएगा।

खर्च का इंतजाम

शिक्षा अधिकार बिल के पास होने के बाद शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग प्रसन्न तो हैं, लेकिन उनका कहना है कि इसे अमल में लाना बेहद जटिल कार्य होगा। केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जरूरी कई बदलाव लाने होंगे। वे राज्य जो आर्थिक तौर पर कमजोर हैं, उन्हें योजना को अमली जामा पहनाने के लिए वित्त आयोग से मदद लेनी जरूरी हो जाएगी।

मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के अनुसार राज्यों की जिम्मेदारी होगी कि वह योजना को अपने यहां लागू करे और बच्चों को शिक्षा दिलाएं। सिब्बल ने लोक सभा में कहा, ‘जो राज्य खर्च नहीं उठा सकता, उसके लिए हम वित्त आयोग के पास जाएंगे।’ उन्होंने यह भी याद दिलाया कि शिक्षा को जन-साधारण तक पहुंचाने में राज्यों की विफलता के कारण ही केंद्र को यह कार्य अपने हाथ में लेना पड़ा है। उनके अनुसार, पहली बार प्रत्येक स्कूल में तमाम बुनियादी सुविधाओं के बारे में सरकार ने सख्ती से कदम उठाया है। अब हरेक मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल को तीन वर्ष के भीतर अपने बुनियादी ढांचे और सुविधाओं को दुरुस्त करना होगा। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उनकी मान्यता समाप्त कर दी जएगी।

मगर दूर है मंजिल

इस सबके बावजूद शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि शिक्षा अधिकार बिल असमानता को बढ़ावा ही देगा। उनके अनुसार सरकारी स्कूलों, राज्य से सहायता प्राप्त स्कूल, विशेष दर्जा स्कूल और गैर सहायता प्राप्त प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता अलग-अलग दर्जे की है और बिल में कहीं समान स्तर की शिक्षा देने की बात नहीं की गई है। वहीं सिब्बल का कहना है कि एक बार शिक्षा के मूलभूत अधिकार तक सभी बच्चों की पहुंच हो जाने के बाद समान स्तर की शिक्षा देने के मामले पर भी कार्य किया जाएगा। कपिल सिब्बल का कहना है कि अध्यापकों को प्रशिक्षित करने के लिए राज्यों को पांच वर्ष का समय दिया जाएगा। लेकिन मौजूदा हालात को देख कर इतना तो साफ है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अध्यापक-छात्रों के बीच के अनुपात को पटरी पर लाने में अभी लंबा समय लगेगा।


देश में बुनियादी शिक्षा की मौजूदा तस्वीर

एनजीओ ‘प्रथम’ के सव्रे में दिखे बेहतरी के संकेत

देश में स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या में लगातार कमी आ रही है।

राष्ट्रीय स्तर पर 7 से 10 वर्ष के 2.7 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं और 11 से 14 वर्ष के स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 6.3 प्रतिशत है।

उत्तर प्रदेश और राजस्थान के अलावा 2007 के बाद से कई राज्यों में स्कूल न जाने वाले बच्चों की प्रतिशत संख्या में गिरावट आई है।

शिक्षा में पीछे रहने वाले बिहार ने तेजी से रफ्तार पकड़नी शुरू की है। बिहार में 6 से 14 साल तक के स्कूल न जाने वाले बच्चों का प्रतिशत 2005 में जहां 13 था, जो अब महज 5.7 प्रतिशत रह गया है।

छह से चौदह वर्ष के बच्चों में प्राइवेट स्कूल में जाने की संख्या में इजाफा हुआ है। 2005 में जहां 16.4 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते थे, तो 2008 में ये आंकड़ा बढ़कर 22.5 प्रतिशत हो गया। कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में प्राइवेट स्कूलों में सबसे ज्यादा लोगों ने नामांकन कराया।

केरल और गोवा के आधे से ज्यादा बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जाते हैं।

2008 में 7 से 10 और 10 से 14 वर्ष के प्राइवेट स्कूल जाने वाले बच्चों में लड़कियों के मुकाबले 20 प्रतिशत लड़के ज्यादा हैं।

कक्षा एक में पढ़ने वाले 24.75 प्रतिशत बच्चों की उम्र 6 वर्ष से कम है।

पांच वर्ष की उम्र तक के 56.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते हैं।

राजस्थान, जम्मू और कश्मीर, पंजब, हिमाचल और हरियाणा के 5 वर्ष तक की उम्र के 70 प्रतिशत बच्चे स्कूल जाते हैं।

हिमाचल, हरियाणा और तमिलनाडु में पांच वर्ष की उम्र के बच्चों की स्कूल जाने की संख्या में पिछले तीन वर्षो में 16 से 20 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के मामले में जबर्दस्त सुधार नजर आता है। छत्तीसगढ़ में तीसरी कक्षा में पहुंचे ऐसे छात्रों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है, जो कम से कम पहली कक्षा की किताब तो पढ़ ही लेते हैं। वर्ष 2007 में ऐसे बच्चों की संख्या राज्य में 31 प्रतिशत थी, जैसे महज एक वर्ष में बढ़कर 70 प्रतिशत हो गया।

मध्य प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्य है, जहां के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की बुनियादी समझ सबसे बेहतर है।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बच्चों की गणित की बेसिक समझ अच्छी हुई है। दोनों ही राज्यों में कक्षा 1 के 91 प्रतिशत बच्चे 1 से 9 तक के नंबरो को आराम से पहचान लेते हैं।

कक्षा पांच में पढ़ने वाले 61 प्रतिशत बच्चे घड़ी के समय को सही तरीके से देख लेते हैं।

45.6 प्रतिशत गांवो में ही प्राइवेट स्कूल है।

67.1 प्रतिशत गांवों में सरकारी मिडिल स्कूल है, तो 33.8 प्रतिशत गांवों में सरकारी सेकेंडरी स्कूल है।

(सभी आंकड़े एनजीओ ‘प्रथम’ की सव्रे रिपोर्ट ‘असर’ यानी एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट-रूरल 2008 से)

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