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25 फरवरी, 2020|9:10|IST

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हो सकता है नरेगा से भी ज्यादा लोकप्रिय और असरदार

छह से चौदह साल की उम्र के गरीब बच्चों के लिए आठवीं कक्षा तक अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा का अधिकार बिल संसद में पास हो चुका है। इसके कानून बन जाने के बाद अगर सरकार ने पूरी ईमानदारी, निष्ठा और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ इसे देश भर में लागू कर दिया, तो यह नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून) से भी ज्यादा पॉपुलर और नई पीढ़ी के लिए जीवन को बदल देने वाला साबित हो सकता है। आइए, देखते हैं कैसे?

इस कानून के तहत, हर प्राइवेट स्कूल को अल्प आय वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना जरूरी हो जाएगा। इस वर्ग से ताल्लुक रखने वाला कोई भी शख्स सीधे, या स्थानीय प्रशासनिक और शिक्षा अधिकारी से आदेश लेकर किसी भी प्राइवेट स्कूल में अपने बच्चे को मुफत में दाखिला दिलवा सकेगा।

हर मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल में इस कानून के अमल पर नजर रखने के लिए एक मैनेजमेंट कमेटी बनेगी, जिसमें छात्रों, अभिभावकों और स्थानीय नागरिकों के अलावा राजनीतिक दलों को भी नुमाइंदगी दी जाएगी। इस कमेटी में शामिल होने के लिए जरूरी नहीं कि आपका बच्चा उस स्कूल में पढ़ता हो। बगैर सरकारी मान्यता के चल रहे स्कूलों पर पहली बार एक लाख रुपए और फिर मान्यता मिलने तक हर रोज 10 हजार रुपए के हिसाब से जुर्माना लगाया जाएगा। स्कूलों को बगैर टीसी के भी बच्चों को दाखिला देना पड़ेगा।

कोई भी आम नागरिक स्थानीय प्रशासनिक और शिक्षा अधिकारी को ऐसे स्कूलों पर कानूनी कार्यवाही करने के लिए शिकायत दे सकता है, जो बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने से इनकार कर रहे हैं।

गरीब वर्ग का कोई भी बच्चा अपने आसपास के किसी भी सरकारी या प्राइवेट स्कूल में प्रवेश के अधिकार की मांग करने के लिए स्वतंत्र होगा। इसके लिए सरकारी अधिकारी स्कूल को आदेश भी दे सकेंगे।

अगर किसी ग्रामीण या शहरी इलाके में सरकारी या प्राइवेट, कोई भी स्कूल नहीं है, तो वहां के बच्चों को पास के गांव या शहर के स्कूल में दाखिला दिलाने की जिम्मेदारी सरकार की होगी। फिर सरकार के लिए तीन साल के अंदर-अंदर उस इलाके में प्राइवेट या सरकारी स्कूल खुलवाना कानूनन जरूरी होगा।

अगर बच्चे के मां-बाप उसकी फीस देने में असमर्थ हैं, तो सरकारी स्कूल के रेट पर सरकार उसकी पढ़ाई का खर्च अदा करेगी। प्राइवेट स्कूलों के लिए ऐसे बच्चों को प्रवेश परीक्षा या डोनेशन देने के लिए मजबूर करने की मनाही होगी। ऐसा करने वाले स्कूलों से भारी जुर्माना वसूला जाएगा। बच्चों को शारीरिक दंड देने वाले शिक्षकों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

खामियां फेर सकती हैं पानी पहली नजर में शिक्षा का अधिकार देने वाला ये कानून क्रांतिकारी नजर आता है। लेकिन इसमें कई ऐसे झोल भी रह गए हैं, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के साथ-साथ अच्छी नीयत से लाए गए पूरे कानून की हवा निकाल सकते हैं। कुछ मिसालें:

यह कानून कहता है कि गरीब बच्चों को दाखिला न देकर शिक्षा के अधिकार से वंचित करने वाले स्कूलों की शिकायत मिलने पर संबंधित अधिकारी ठीक समझे, तो कार्रवाई करे, और न समझे तो कोई कार्रवाई की जरूरत नहीं है।

कानून यह भी कहता है कि अगर किसी स्कूल, सरकार या शिक्षक ने किसी गरीब बच्चे को ‘बगैर बदनीयती’ के शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा, तो इसे गैर-कानूनी नहीं माना जाएगा। साथ ही, कानून इस बारे में खामोश है कि ‘सही नीयत’ किसे माना जाएगा।

पीड़ित पक्ष, यानी दाखिले से वंचित गरीब बच्चे के मां-बाप को इस कानून ने ये हक नहीं दिया है कि वे सीधे जाकर दोषी स्कूल पर कानूनी कार्यवाही शुरू करा दें। इसके लिए उन्हें पहले सरकारी अधिकारियों के यहां चक्कर लगाने पड़ेंगे।

जाहिर है, आम आदमी को अपने दूसरे कानूनी अधिकारों को हासिल करने के लिए जिस तरह कदम-कदम पर जद्दोजहद करनी पड़ती है, उसी तरह गरीब बच्चों और उनके मां-बाप को शिक्षा का यह अधिकार पाने के लिए भी जमकर पसीना बहाना पड़ेगा। और इसके बाद भी उन्हें अपना हक मिल जाएगा, इसकी गारंटी कम से कम यह कानून तो नहीं दे रहा।

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