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पहले जानें कि महिलाएं चाहती क्या हैं

प्रिय श्री गुलाम नबी आजाद,
भारत में जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश के लिए आपकी अनुचित टिप्पणी के बारे में बहुत से लोगों ने आपको लिखा होगा। कुछ लोगों ने आपकी बात का मजक भी उड़ाया होगा। खासकर आपकी इस बात का कि देर रात को टेलीविजन देखने की आदत एक प्रभावशाली गर्भनिरोधक है। कुछ लोग आपकी टिप्पणी से आहत हैं। उन्हें लगता है कि या तो आपको भ्रमित किया जा रहा है या गलत सूचना दी जा रही है अथवा आप वक्त की सुई को उल्टा घुमाना चाहते हैं।

एक अंग्रेजी समाचारपत्र को दिए साक्षात्कार में आपका वक्तव्य है कि - भारत एक ज्वालामुखी पर बैठा है, जो कभी भी फट सकता है। मुझे लगता है कि आपके कथन का आशय जनसंख्या बम या जनसंख्या विस्फोट से है। यह वही बात है, जो 1970 के दशक में कही जाती थी। हरियाणा सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था में चुने गए प्रतिनिधियों पर जब दो से अधिक बच्चे होने का प्रतिबंध थोपा था, तब जुलाई 2003 में उच्चतम न्यायालय ने इसे उचित ठहराया था। न्यायालय ने जनसंख्या विस्फोट की बात स्वीकार की थी।

बढ़ती जनसंख्या को रोकने के कारण भी लगभग एक जैसे हैं। आपके शब्दों में- जब जनसंख्या बढ़ती है तो भूमि क्षेत्र कम हो जाता है। प्रत्येक विकास कार्यक्रम का अर्थ होता है भूमि में और कमी, जिस कारण खाद्यान्न में कमी आती है। जनसंख्या वृद्धि का मतलब ज्यादा संख्या में निर्धन। बढ़ती आबादी, गरीबी, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था खराब होने का मुख्य कारण है। इसी वजह से नक्सलवाद पनपता है।

लगता है आपने थामस रॉबर्ट माल्थस को पढ़ा है। माल्थस का मानना था-  मनुष्य के जीवन निर्वाह के लिए धरती की जितनी उत्पादन क्षमता है, जनसंख्या वृद्धि उससे कहीं अधिक है। समय के साथ माल्थस का यह सिद्धांत तो गलत सिद्ध हो गया, किन्तु अभी भी कुछ लोग हैं जो उसके विचारों से सहमत दिखते हैं।

पिछले दो दशक में जनसंख्या और विकास के बीच घनिष्ठ संबंध पर जो विचार-विमर्श हुआ, उस जानकारी का आपके वक्तव्य में स्पष्ट अभाव नजर आता है। यह हैरानी की बात है। यहां तक कि भारत में भी काफी समय पहले जनसंख्या नियंत्रण की जगह परिवार कल्याण अपनाया गया और अब उसका स्थान प्रजनन स्वास्थ्य व अधिकार ने ले लिया है। यह केवल राजनीतिक रूप से सही शब्दावली का मसाला नहीं है। शब्दों में बदलाव इस बात का प्रमाण है कि लोगों, खासकर महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक स्तर में सुधार के बाद ही जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लग सकता है।

मैं आपका ध्यान राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2005-06) के ताजा आंकड़ों की ओर दिलाना चाहूंगी। इसके अनुसार भारत में प्रजनन दर अब 2.7 हो गई है, जो 1993 में जब पहला सर्वेक्षण हुआ था, 3.4 थी। दूसरे शब्दों में भारतीय महिला औसत 2.7 बच्चे पैदा करती हैं।

इससे भी बढ़कर दूसरी सच्चाई यह है कि कम से कम नौ राज्यों- महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और पंजाब- में प्रजनन दर 2.1 और 1.8 के बीच है। इन सब राज्यों में प्रजनन दर में लगातार कमी आ रही है। स्पष्ट है कि जिन राज्यों में महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक स्तर बेहतर हुआ है, वहां प्रजनन दर में स्पष्ट कमी देखी जा सकती है।

यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भी यह दर घटी है। 1993 में वहां प्रजनन दर 4.82 थी, जो 2005-06 में कम होकर 3.49 हो गई। दुर्भाग्य से बिहार में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। सन् 2000 में वहां प्रजनन दर 3.49 थी,  जो 2005-06 में बढ़कर चार हो गई। आर्थिक व सामाजिक विकास की दृष्टि से ये दोनों प्रदेश अन्य राज्यों से पीछे हैं।

निश्चित रूप से आप यह जानते होंगे कि 1994 में काहिरा (मिस्र) में जनसंख्या और विकास पर हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में भारत सहित 179 देशों ने एक कार्यक्रम स्वीकार किया था। कार्यक्रम के अनुसार महिलाओं के अधिकार जनसंख्या नियंत्रण संबंधी किसी भी कार्यक्रम का अभिन्न अंग हैं। यह कार्यक्रम स्पष्ट रूप से उन नीतियों के खिलाफ है, जो महिलाओं को उनकी पसंद और मानवाधिकारों से वंचित करती हैं। इस कार्यक्रम के परिणामस्वरूप भारत ने जनसंख्या वृद्धि पर दंडात्मक नियम अपनाने की नीति को छोड़ दिया।

फिर भी कुछ राज्य पंचायत स्तर पर चुने जाने वाले जनप्रतिनिधियों पर दो बच्चों की शर्त थोपने का हथकंडा इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसा प्रतिबंध हरियाणा के अलावा आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में भी लागू है। इनमें से केवल आंध्र प्रदेश उन राज्यों में है, जहां जनसंख्या वृद्धि दर काबू में है। स्पष्ट है कि ऐसी नीति प्रभावशाली नहीं है। इससे महिला प्रतिनिधियों को दंड और लिंग निर्धारण को प्रोत्साहन तथा कन्याभ्रूण हत्या को बढ़ावा मिलता है। अगर दो बच्चे ही पैदा करने की अनुमति हो तो ज्यादातर भारतीय दोनों लड़के या ज्यादा से ज्यादा एक लड़का और एक लड़की चाहेंगे।

साक्षात्कार में आपने यह भी कहा- हमें लोगों के दिमाग में यह बात बिठानी है कि लड़का हो या लड़की, बच्चा तो बच्चा है। मंत्री महोदय आपने यह बात बिल्कुल ठीक कही। लेकिन अगर जनसंख्या विस्फोट जैसे वक्तव्य दिए जाएंगे, तब अच्छी बातों पर भी पानी फिर जाएगा। जनसंख्या नियंत्रण की आड़ में महिलाओं की प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण का मुद्दा जिंदा रहेगा। बाल मृत्यु दर तथा जन्म देने से पहले तथा जन्म देने के बाद महिलाएं जिंदा रह पाती हैं या नहीं जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पृष्ठभूमि में धकेल दिए जाएंगे।

नीति बदलने से पहले उन महिलाओं के साथ कुछ समय बिताएं, जो जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम के केंद्र में हैं। यह जाने कि वे क्या चाहती हैं? राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार गर्भनिरोधकों की 13 प्रतिशत जरूरत पूरी नहीं होती। दूसरे शब्दों में महिलाओं को सलाह, गर्भनिरोधकों और स्वास्थ्य परामर्श की जरूरत है, जो उन्हें नहीं मिलता। अगर आप महिलाओं से बात करें तो महसूस करेंगे कि उनके कुछ मूलभूत सरोकार हैं। भारत में मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख पर 301 है। मरने वाली महिलाएं कुपोषित हैं। अतिरिक्त रक्तस्राव और मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में उनकी मौत हो जाती है। बिहार जैसे राज्य में तो मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख पर 371 है। अगर मां बच भी जाती है तो इस बात की गारंटी नहीं कि उसका बच्चा बच जाएगा। जन्म के तुरंत बाद बहुत से बच्चों की मौत हो रही है। अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच हो इस बारे में कुछ करें। तब आपको जनसंख्या विस्फोट के बारे में सोचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

भवदीय।

kalpu.sharma@gmail.com
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं

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