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तमिलनाडु : राज और उनके विवाद

केंद्रीय संचारमंत्री एंडीमुथु राज ने वकालत की पढ़ाई की है और अक्सर यह कहते रहते हैं कि वे कानून के खिलाफ कुछ नहीं करेंगे। लेकिन फिर भी अपनी परेशानियां वे खुद ही खड़ी करते हैं। संप्रग सरकार के पांच साल पूरे होने पर उन्होंने न सिर्फ दूरसंचार क्षेत्र को पचड़े में फंसा दिया था, बल्कि इसमें पैसा लगाने वालों को भी खासा परेशान कर दिया था। लेकिन जब मनमोहन सिंह ने दूसरी बार मंत्रिमंडल बनाया तो वे वापस उसी जगह पहुंच गए। पिछली बार पहले राज को पर्यावरण मंत्री बनाया गया था, लेकिन फिर उन्हें संचार व सूचना तकनीक मंत्रालय सौंप दिया गया।

और जब वे दोबारा संचार मंत्रालय में आ जमें हैं तो फिर एक और विवाद पैदा हो गया है। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रघुपति का आरोप है कि एक केंद्रीय मंत्री ने उन्हें डॉ . कृष्णामूर्ति और उनके बेटे श्रीधर के पक्ष में फैसला करने का दबाव डाला है। इन दोनों के खिलाफ फर्जी मार्कशीट घोटाले पर सीबीआई की जांच चल रही है। हालांकि न्यायमूर्ति ने किसी मंत्री का नाम नहीं लिया है, लेकिन अन्नाद्रमुक की नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता का कहना है कि यह काम राज का ही है और उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल से बर्खास्त किया जाना चाहिए। जयललिता ने एक बयान में कहा है कि ‘यह काम राज के आलावा किसी और का नहीं हो सकता और इसे समझने के लिए किसी सुपरमैन की बुद्धि की जरूरत नहीं है, वे पहले ही संचार घोटाले में शमिल रहे हैं।’

विपक्ष ने इस मसले पर राज्यसभा में पूरे एक दिन तक काम नहीं होने दिया। कई खबरों में बताया गया है कि वे फर्जी मार्कशीट घोटाले के अभियुक्त के वकील के नजदीकी हैं।

वैसे द्रमुक के बहुत सारे वरिष्ठ नेता भी इस बात से खफा हैं कि काफी जूनियर होने के बावजूद राज को इतना बड़ा पद दे दिया गया है। इसलिए वे इन सारी बातों पर काफी जोर दे रहे हैं, जो जज को धमकाने के मामले में शक की सुई को राज की तरफ घुमाती हैं। इनमें से एक तो यह है कि मामले के प्रमुख अभियुक्त डॉ. कृष्णामूर्ति श्रीपेरंदूर के हैं और राज उस क्षेत्र से सांसद हैं।

कृष्णामूर्ति जिस इमारत से अपना क्‍लीनिक चलाते हैं, वह उनकी अपनी है और उसी इमारत में राज की लीगल कंसल्टेंसी कंपनी का दफ्तर चलता है। कृष्णामूर्ति जमीन जयदाद का धंधा भी करते हैं और राज के नजदीकी रिश्तेदार इस कारोबार में उनके सहयोगी हैं।

यह मामला जब संसद में उठा तो लगभग सभी दलों के सांसदों से प्रधानमंत्री से मद्रास उच्च न्यायालय के जज को धमकी देने वाले मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भी दिया गया, जिसमें मामले की जांच की मांग की गई है। इस ज्ञापन पर 180 सांसदों के दस्तखत हैं। यह पहला मौका है, जब किसी जज ने आरोप लगाया है कि उसे किसी केंद्रीय मंत्री ने धमकी दी।

संचार मंत्री एक और विवाद में तब और फंस गए जब मद्रास उच्च न्यायालय के ही जस्टिस के. चंद्रू ने एक पाक्षिक पत्रिका की ओर से दायर याचिका की सुनवाई करते हुए पत्रिका पर से मंत्री और उनके परिवार के लोगों के खिलाफ खबर छापने पर लगा स्थगन हटा लिया। जूनियर विकातन नाम की यह पत्रिका काफी समय से स्पैक्ट्रम घोटाले पर खबरें छाप रही थी, चुनाव के दौरान मंत्री ने उस पर स्टे ले लिया था।

संचार मंत्री पर मुकदमे का खर्च देने के लिए दस हजर रुपए का जुर्माना भी लगा दिया गया। इसके तुरंत बाद दो बातें हुईं। एक तो बिना किसी के दस्तखत का एक पत्र बांटा जाने लगा, जिसमें जज की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए थे। पत्र तमिल में लिखा गया था और कहा जाता है कि यह जज के फैसले की प्रति मीडिया के पास पहुंचने से पहले ही पत्रकारों को मिल गया था।

दूसरे जूनियर विकातन का अगला अंक बाजार में आया तो उसमें एक स्टिंग ऑपरेशन के नतीजे दिए गए थे। इस पत्रिका की रिकॉर्ड बिक्री हुई और सभी टेलीविजन चैनलों पर भी यह मामला छाया रहा, पत्रिका ने उन्हें इसके विजुअल भी उपलब्ध करा दिए थे। स्टिंग ऑपरेशन में द्रमुक की संयुक्त सचिव गायत्री श्रीनिवास कहती हैं कि तमिलनाडु में वाईमैक्स का भारत संचार निगम का ठेका उन्हीं को मिलेगा, अगर उनके पास ए. राज को ‘घूस’ देने के लिए पर्याप्त पैसे हुए। उन्होंने नाम लेकर कहा कि राज ही सारा काम कराएंगे।

यह भी कहा जाता है कि एम. अलागिरी ने अपने पिता से कहा है कि दिल्ली में पार्टी की छवि खराब हो रही है, इसलिए राज की छुट्टी कर देना ही बेहतर होगा। दबाव करुणानिधि पर भी बन रहा है और मनमोहन सिंह पर भी।

radhaviswanath73@yahoo.com
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं

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