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ईश्वर तत्व

परमपुरुष या ईश्वर तत्व दो प्रकार के हैं : एक,  हम दर्शन से सीखते हैं कि ईश्वर इस तरह के हैं, उस तरह के हैं, इत्यादि। यह हुआ दार्शनिक ईश्वर। ईश्वर दार्शनिक थे, हैं और रहेंगे भी।

किन्तु मनुष्य के मन का स्वभाव विभिन्न तरह का है। मनुष्य युक्ति के रास्ते पर चलेगा, चलना चाहता है, चलना उचित भी है - सब कुछ ठीक है, किन्तु उन्नत जीव होने के कारण मनुष्य में सेंटिमेंट (भावप्रवणता) भी एक चीज है।

जितने भी जीव थोड़े उन्नत हुए हैं, उनमें भी सेन्टिमेंट होता है, जैसे- बन्दर, कुत्ता। मनुष्य में यह जो सेंटिमेंट है, वह कुछ अधिक मात्रा में है, क्योंकि मन विकसित होने से मन कोमल होता है। वह स्थूल नहीं है, वह पत्थर नहीं है, उसमें कोमलता है। वह देखता है कि उस कोमलता का छाप देने का अवसर कम है, तो वह उसे मन नहीं भाता।

युक्ति से वह परमपुरुष को जिस तरह से चाहता है, उस तरह से पाता नहीं, किन्तु प्राण का आवेग कहता है - ‘हाँ प्रभु ! तुम केवल मेरे हो।’ यही हुई सेंटिमेंट की वस्तु। दर्शन कहता है- वे ‘अनन्त’ हैं, ठीक है, मैं क्या कह रहा हूँ? हाँ,

‘अनन्त हयेछ, भालोइ करेछ, थेको चिरदिन अनन्त अपार।
धरा यदि दिते फुराइया जेते, तोमारे धरिते के चाहितो आर?’

यानी अनन्त बने हो, अच्छा ही है। लंबे समय तक अनन्त अपार रहो। यदि तुम पकड़ में आ जाते और शेष हो जाते, तब फिर तुम्हें पकड़ना कौन चाहता? सब मान रहा हूँ, सब समझ रहा हूँ, फिर भी चाह रहा हूँ क्या?

हाँ, वे जरा सा मेरी ओर देखकर मीठी हँसी हँस दे, ‘कैसे हो?’ जरा सा कहें, अरे मैं तो हूँ ही, तू घबरा क्यों रहा है?’ इसी से युक्ति के ईश्वर, युक्ति के परमपुरुष को मनुष्य अपने प्राणों के आवेग के द्वारा अपने समीप पाना चाहता है।

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