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मुठभेड़ और मानसिकता

उत्तराखंड से मणिपुर तक फर्जी मुठभेड़ें हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी न्याय प्रणाली के लिए गंभीर चुनौती बन कर खड़ी हुई हैं। ऊपर से जब मध्यवर्गीय समाज इसे ही न्याय मानकर अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी बताने लगता है तो स्थितियां और बिगड़ जाती हैं। इसका समाधान महज जांच और सजा से ही नहीं मुठभेड़ की मानसिकता से निकल कर न्याय की मानसिकता बनाने और उसकी नई व्याख्या करने से होगा। सीबीआई की आरंभिक जांच में अगर यह बात निकल कर आ रही है कि देहरादून के जंगलों में रणबीर नाम के युवक को जिस मुठभेड़ में मारा गया वह फर्जी थी तो इससे आम जनता का संदेह पुख्ता होता जा रहा है। इसी तरह का संदेह मणिपुर की जनता को भी उस समय हुआ, जब पिछले महीने 23 जुलाई को एक गर्भवती महिला रुबीना देवी और पूर्व उग्रवादी चोंगखम संजीत को इंफाल में मुठभेड़ में मार दिया गया। उस मुठभेड़ ने सशस्त्र बल (विशेष शक्ति) अधिनियम पर फिर बवाल खड़ा कर दिया है। हो सकता है, वहां भी न्यायिक जांच के बाद जनता का संदेह उसी तरह से सही साबित हो, जैसा उत्तराखंड में हो रहा है। फर्जी मुठभेड़ें कभी  सुरक्षा बलों के छोटे समूह की भ्रष्टाचारी इच्छाओं के चलते होती हैं तो कभी उन्हें मध्यवर्ग और व्यवस्था की व्यापक सहमति प्राप्त होती हैं। अक्सर यह दोनों प्रवृत्तियां मिलकर एक दूसरे को ताकत प्रदान करती हैं। देहरादून और इंफाल के मुठभेड़ इसके उदाहरण हैं।

यह सही है कि हमारे सुरक्षा बलों को मानवाधिकारों का विधिवत पाठ नहीं पढ़ाया जाता, इसीलिए वे समाज के एक वर्ग की हिफाजत के लिए दूसरे के मानवाधिकार के उल्लंघन को जरूरी मानते हैं। लेकिन उसी से साथ यह भी सच है कि हम न्याय और मानवाधिकार को निरपेक्ष अवधारणा मानने के बजाय उसे स्थान और समय के सापेक्ष मान कर चलते हैं। इसीलिए अपनी सहूलियत के मुताबिक उसकी व्याख्या करते रहते हैं। न्याय और मानवाधिकार का यह सुविधावाद हमारे मध्यवर्ग के भीतर उस खतरनाक मानस को जन्म देता है जिसके चलते वह फर्जी मुठभेड़ों को सही बताने से लेकर गौरवान्वित करने तक उतर आता है। मुख्यधारा के समाचार माध्यम से लेकर ‘अब तक 56’ और ‘पेज थ्री’ जैसी फिल्मों तक यह मानसिकता दिखाई पड़ती है। इसके विपरीत अमर्त्य सेन ने न्याय और मानवाधिकार के घनिष्ठ रिश्ते को कायम करने का जो महत्वपूर्ण सुझाव दिया है, लोकतंत्र के हित में हमें उसको अपनाना होगा।

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