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दो टूक

बाजार में दूसरे टेक्सटाइल उत्पादों के मुकाबले खादी खड़ी रह सके, इसके लिए उसकी सब्सिडी बढ़ाई जा रही है। यह सब्सिडी उपभोक्ताओं को कीमत में छूट देने के काम आएगी। सवाल लेकिन यह है कि सरकारी बैसाखी आखिर कब तक? क्या खादी ग्रामोद्योग भी एयर इंडिया की तरह सरकारी ऑक्सीजन पर ही जिंदा रहेगा? जिस खादी से बापू ने आजादी का ताना-बाना बुना था, वह अपने अस्तित्व के लिए सरकारी फंड की गुलाम क्यों? ऐसा क्यों है कि कभी सस्ती, सुंदर और टिकाऊ कहलाई जाने वाली खादी आज न सस्ती रही, न सुंदर रही और न ही टिकाऊ!

प्रतिस्पर्धा की अग्निपरीक्षा में वह पिछड़ती क्यों रही? उसे आत्मनिर्भर बनाने और बाजार के बदलते मिजाज के मुताबिक सुधारने के प्रयास विफल क्यों होते रहे? क्या 16 हजार करोड़ रुपये सालाना कारोबार वाले खादी ग्रामोद्योग की दशा-दिशा पर बुनियादी तौर से पुनर्विचार की जरूरत नहीं?

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