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भाईचारा साइकोलॉजी और बायलॉजी का

इसमें कोई दोराय नहीं कि इंसानी दिमाग और इससे जुड़ी बीमारियों को समझने के लिए इंसान को काफी दिमाग खपाना पड़ता है। जानकार लोग कहते हैं कि इससे परेशान इंसान अगर मानसिक रोगों के जीवविज्ञान को ठीक से समझाने में कामयाब हो जाए, तो न केवल मानसिक बीमारियों के कारणों का सटीक विश्लेषण और इलाज करना पहले से कहीं अधिक आसान हो सकता है, बल्कि इंसान खुद को बेहतर तरीके से पहचान भी सकता है और अपने मन-मस्तिष्क की कार्यप्रणाली के बारे में और गहराई से जानने में भी समर्थ हो सकता है। मेंटल हैल्थ के क्षेत्र में यह कुछ-कुछ वैसे ही क्रांतिकारी साबित हो सकता है, जैसे कि अस्सी के दशक में हंटिंगटन डिजीज के लिए जिम्मेदार जीन की खोज।

तब इस खबर को पढ़कर कई मनोवैज्ञानिकों ने उम्मीद लगाई थी कि अगर सिजोफ्रेनिया, ऑटिज्म या डिप्रैशन के लिए जिम्मेदार जीन्स का भी पता लग जाए, तो क्या कहने! उसी दिन से कई जीव और मनोवैज्ञानिक इस खोज में जुट गए और पूरे जोश और दमखम के साथ अब तक शोध और अध्ययन भी करते रहे हैं। इस मामले में उन्हें कुछ वर्षो पहले तक तो ज्यादा कामयाबी नहीं मिल पाई थी, लेकिन जेनेटिक्स या जीव विज्ञान से मानसिक बीमारियों के आपसी रिश्ते की उम्मीद लगाए बैठे तबके को हाल के वर्षो में कुछ निश्चित सफलता हाथ लगी है। असल में ऐसा जेनेटिक्स के क्षेत्र में आई नवीनतम प्रगति की वजह से मुमकिन हुआ है। इसके हिसाब से देखें, तो अगले एक-दो दशक में बड़ी कामयाबी मिल सकती है।

डाउन-सिंड्रोम और ऑटिज्म के क्रोमोसोम
इस क्षेत्र में एक नई और अहम खोज ये हुई कि जीनोम में जितनी अब तक मानी जाती थी, उससे कहीं अधिक परिवर्तनीयता होती है। यह सीएनवी यानी कॉपी नंबर वैरिएशन का स्वरूप ले लेती है। इसे हम आसान शब्दों में यूं कह सकते हैं कि क्रोमोसोम के हिस्सों को खत्म करना और उनका डुप्लीकेट बनाना मुमकिन हो सकता है। इसके लिए सैंकड़ो जीन्स की जरूरत पड़ती है। इसकी एक सुपरिचित मिसाल है क्रोमोसोम-21 की नकल, जिससे डाउन-सिंड्रोम नाम की मानसिक बीमारी होती है। अब पता चला है कि हर किसी के जीनोम में ऐसी परिवर्तनीयता मौजूद हो सकती है।

इसी प्रकार डि-नोवो म्युटेशन नाम के सीएनवी का संबंध ऑटिज्म से होने का पता चला है। डि-नोवो म्युटेशन शरीर के केवल एक टिश्यू में होते हैं, चाहे वह स्पर्म हो या एग। और अक्सर प्रजनन की उम्र के आखिरी पड़ाव में ही होते हैं। इसलिए जो लोग बड़ी उम्र में संतान पाने की जोखिम उठाते हैं, उन्हें ही इसका नतीजा अपनी अगली पीढ़ी में देखने को मिलता है। यही वजह है कि ऑटिज्म के शिकार ऐसे बच्चे भी हो जाते हैं, जिनके परिवार में मां-बाप या भाई-बहनों को ये बीमारी नहीं होती।

दरअसल जिन मां-बाप के शरीर में ये डि-नोवो म्युटेशन हो जाता है, उनके बच्चों को ऑटिज्म होने की संभावना काफी ज्यादा हो जाती है। खास बात ये है कि इन मां-बाप के क्रोमोसोम में ये म्युटेशन नजर नहीं आता। इसका वजूद सिर्फ उनके स्पर्म या एग में होता है। लेकिन इनके जिस बच्चे को ऑटिज्म हो जाता है, माना जाता है कि उसकी अगली पीढ़ियों में ये बीमारी आनुवंशिक तौर पर चलती रहेगी। मनोवैज्ञानिकों की राय में मौजूदा दौर में ऑटिज्म के मामलों में इजाफे की वजह यही डि-नोवो सीएनवी है।

उदारीकरण की नई वैश्विक अर्थव्यवस्था में जीवन शैली में जो परिवर्तन आया है, उसके चलते लोग देर से शादी और उसके भी काफी अरसे बाद संतानोत्पत्ति के बारे में सोचते हैं, जिससे अक्सर ऑटिज्म के शिकार बच्चों के जन्म की आशंका सच साबित हो जाती है। यही नहीं, ऐसी जीवन शैली अपनाने वाले लोगों में डि-नोवो म्युटेशन की वजह से सिजोफ्रेनिया होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

अवसाद, याददाश्त और जीवविज्ञान
वैज्ञानिकों को जुनून, एंग्जयटी और अवसाद का भी जीवविज्ञान से रिश्ता होने के संकेत मिल रहे हैं। मानसिक असंतुलन का इलाज करने वाले डॉक्टर बीमारी को समझने के लिए इसके जविक आधार का सहारा ले रहे हैं, क्योंकि उन्हें इससे इलाज में आसानी महसूस होती है। यही नहीं, इससे कई बार मनोरोगों के बेकाबू होने की स्थिति को टालने में भी मदद मिलती है। बायोकैमिस्ट्री और बायोफिजिक्स के विशेषज्ञों का मानना है कि सीखने की क्षमता और याददाश्त के मामले में भी बायलॉजी का अहम रोल होता है क्योंकि हर व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार, माहौल, पढ़ाई-लिखाई, रूटीन कामकाज और पेशे का असर उसके दिमाग पर जरूर पड़ता है। हम जो कुछ सीखते-देखते हैं, उसे लंबे अरसे तक याद रखना या भूल जाना, कुछ खास ब्रेन-सेल्स में मौजूद हमारे जीन्स की गतिविधियों पर ही निर्भर करता है क्योंकि इसका सीधा असर हमारे दिमाग के नर्व सेल्स पर पड़ता है।

ब्रेन मैपिंग की मदद
‘इन सर्च ऑफ मेमरी’ के मशहूर लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता जैव भौतिकीविद् प्रो. एरिक कैंडेल का तो यहां तक कहना है कि साइकोथरेपी की वजह से इंसान के व्यवहार में जो स्थायी बदलाव आता है, उसका असर दिमाग की संरचना पर भी हमेशा के लिए पड़ जाता है। इसका ठीक-ठीक पता लगाने के लिए ब्रेन मैपिंग की मदद भी ली जा रही है। मसलन, वे दावा करते हैं कि ऑब्सेसिव कंपल्सिव न्यूरोसिस या अवसाद का मनोवैज्ञानिक इलाज कामयाब हो जाने के बाद, रोगी के दिमाग से इन गड़बड़ियों के जैविक चिह्न् हट जाते हैं।

क्यों रुक जाता है मानसिक विकास
माता-पिता और समाज के लिए परेशानियों को सबब होते हैं मनोरोगी, लेकिन ये मानसिक विकास रुकता क्यों है? मनोविज्ञानी डॉ. दिव्या प्रसाद के अनुसार लोग भूल जाते हैं कि वे भी सामान्य व्यक्ति की तरह होते हैं, बस उनका मानसिक विकास रुक जाता है। मानसिक रोगी तीन तरह के होते हैं। 

जन्म से पहले
क्रोमोसोम या गुण सूत्र विकार : गुण सूत्रों की संख्या कम या ज्यादा होने से या इसमें कोई रचनात्मक दोष आ जाने से बच्चा मनोरोगी हो सकता है। उसके नाक-नक्श असामान्य हो जाते हैं। यदि गर्भवती महिला की आयु अधिक हो तो यह संभावना अधिक बढ़ जाती है।

जीन संबंधी दोष : इससे भी गर्भ में विकास पिछड़ जाता है। यह दोष एक से दूसरी पीढ़ी में आ जाता है। जीन संबंधी मनोरोग से शारीरिक विकृतियां भी उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए जांच जरूर करानी चाहिए।

थायरॉइड की कमी : आयोडीन की कमी के कारण थॉयराइड ग्रन्थि कम काम करती है लिहाज भ्रूण में थायरॉइड की कमी से बच्चे का मानसिक विकास रुक जाता है। ऐसे में गर्भवती महिला को आयोडीन देकर या जन्म के बाद बच्चे को आयोडीन देकर बचाया जा सकता है।

जन्म के समय
समय पूर्व जन्म लिए या दो किलोग्राम से कम वजन के बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास रुक सकता है। जन्म के तुरंत बाद यदि सांस की कोई समस्या हो जाए तो सामान्य जन्मा बच्चा भी मनोरोगी हो सकता है। प्रसव के दौरान हुई किसी असावधानी से, औजरों के गलत प्रयोग से, बच्चे के सिर में चोट आ जाने से, प्रसव होने में अधिक देरी तथा गर्भाशय में बच्चे की असामान्य स्थिति होने से भी मस्तिष्क प्रभावित हो सकता है।

जन्म के बाद
संतुलित आहार : मानसिक रूप से स्वस्थ नवजत शिशु को यदि संतुलित आहार न मिले, उसके भोजन में प्रोटीन और काबरेहाइड्रेट की कमी हो तो मस्तिष्क पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाता।

तेज बुखार : मस्तिष्क ज्वर यानी मेनिनजइटिस, बहुत तेज बुखार या दौरे पड़ने से भी नवजात बच्चे पर असर पड़ सकता है।

सिर में चोट : अठारह वर्ष की आयु तक यदि सिर में चोट आती है तो भी मानसिक विकास रुक सकता है। नवजात शिशु के संबंध में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

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